अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

ऊह ला ला : इसमें डर्टी डर्टी क्‍या है, डर्टी डर्टी ....

>> बुधवार, 15 फरवरी 2012


समूचा लोकतंत्र डर्टी हो गया। विधानसभा डर्टी हो गई। तब नहीं हुआ था जब इसके मुंह पर कालिख मली जा रही थी। कालिख भी कोई और नहीं, हम भीतर वाले, आपके लोकतंत्र के सच्‍चे पहरूए मल रहे थे। कुर्सियां फेंक रहे थे, माईक तोड़ रहे थे, गालियां दे और स्‍वीकार रहे थे, हाथापाई कर रहे थे, अपनी मन और तन की मजबूती का नंगा नाच दिखला रहे थे, तब आपको कोई बुराई नहीं नजर आई, सिर्फ थोड़ा सा लोकतंत्र शर्मसार हुआ और फिर सामान्‍य हो गया। होली का त्‍योहार हो, न हो। दीवाली का इंतजार कौन करता है। जब पटाखे फोड़ने हैं, होली मनानी है – तो मनानी है, कौन है माई का लाल जो जुर्रत करे हमें रोकने की। यह तो हम गुण्‍डों की शराफत मानिए कि इतनी आसानी से इस्‍तीफा दे दिया। नहीं दे देते तो आप बर्खास्‍त कर लेते। पर उससे हमारा क्‍या बिगड़ जाता। क्‍या हमारा काला धन गायब हो जाता। हमारा काला मन गोरा हो जाता। फिर क्‍या तीर चला लिया आपने, अपनी खुद की ही बदनामी करवाई। यह तो हुआ नहीं कि कुछ ले देकर, या डर्टी पिक्‍चर खुद ही देखकर मामले को रफा, बिना कोई दफा लगाए कर देते। 
सब नाम के भूखे हैं। सबकी नीयत में छिपे हुए धोखे हैं। जब फिल्‍म देखना मना नहीं है तो पिक्‍चर डर्टी हो, तो क्‍या फर्क पड़ता है, यह कहो कि आपके सबके मन मैले हैं। जब तक हम बुराई से परिचित ही नहीं होंगे, उसकी एक एक खामी को विस्‍तार से नहीं जानेंगे तो उसे दूर करने के उपाय कैसे तलाशेंगे। पर आपकी और आपके तंत्र के समूचे लोक की मानसिकता दूषित हो चुकी है। कूड़े के पास से गुजरेंगे तो उस पर निगाह तो जाएगी ही। फिर ऐसे उपकरण ईजाद ही किसलिए किए हैं, जब इनका भरपूर उपयोग नहीं कर सकते हैं। कहने की आजादी पर तो रोक लगा नहीं पा रहे हैं, देखने की आजादी के झण्‍डे फाड़ने/उतारने पर आमादा हैं। बसंत का मौसम पीलापन लिए हुए हैं, हमें पीलापन पीलिया बीमारी की तरह महसूस होता है इसलिए आसमानी नीले की ओर रुख कर लिया। चमकती तेज तर्रार किरणमयी नीली फिल्‍म देख ली तो उसे पोर्न का नाम दे दिया। यह भी नहीं सोचा कि भगवान ने हमको इस धरती पर भेजा है, जब उसने ही कपड़े नहीं पहनाए तो हम क्‍यों उनके पावन कार्य में दखल देने चले हैं। 
हमसे अच्‍छे तो जानवर हैं, चाहे पूजा पाठ आस्‍था श्रद्धा का दिखावा नहीं करते हैं परंतु जैसे सृष्टि नियंता भेजता है, उसी हाल में खुश रहते हैं। कभी उनके यहां पर कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति खराब होती देखी है, उनके थाने, पुलिस, न्‍यायपालिका देखी है, कभी जांच बैठाते देखा है – कैसे देखोगे उन्‍हें परम सत्‍ता में विश्‍वास है, आप चाहे उसे अंधविश्‍वास का नाम दे दो परंतु विश्‍वास तो आपका आंखें होते हुए भी अंधा है, काना है। मोबाइल पर विधानसभा में बैठकर नीली फिल्‍म क्‍या देख ली, अंधों में काना राजा बना दिया। हर जगह हमारी चर्चा है, नाम है, कौन कहता है कि यह बदनामी है, यह तो आपकी बदगुमानी है। आप सुर्खियां नहीं बटोर पाए तो लगे तोहमत लगाने। मियां जरा अपने तहमद के भीतर झांका होता तो सब असलियत खुद ब खुद सामने आ जाती। हमने पब्लिकली हिम्‍मत तो की। एक आप हैं कि हमारे हौसले को परवान चढ़ाना, सम्‍मानित करना तो दूर, थुक्‍का फजीहत करने से बाज नहीं आ रहे हैं। 
सब जानते हैं कि कौन कितना दूध का धुला है, किसने अपने शरीर पर दही मला है, कौन घी में नहाया है, ऐसा कौन रह गया है, जिसने इस पानी को हाथ नहीं लगाया है। कौन सिर्फ फलों और सब्जियों के ज्‍यूस और सूप पर ही डिपेंड रहा है। कौन मदिरा से बच पाया है, जब ऐसा नहीं है तो फिर क्‍यों इतना हल्‍ला मचाया है। तूफान सब अपनी जेबों में भर भर कर ला रहे हैं, यहां तक तो पहुंच नहीं पा रहे हैं और सारी आंधी तूफान रास्‍ते में ही गिरा रहे हैं। कोई सावधानी नहीं और देश के सुरक्षा के टेंडर उठा लिए हैं। अब महसूस हो रहा है कि कित्‍ती बड़ी भूल हो गई हमसे, फिल्‍म नीली थी तो क्‍या हुआ, उसे हरा चश्‍मा पहनकर देखा जाना चाहिए था। वो दिन भूल गए जब बिग बी के घर में एक पोर्न स्‍टार को बंद कर दिया था, बंद तो नाम के लिए किया था, देश का बच्‍चा बच्‍चा उसे ही देखने को लार टपका रहा था। तब रोक नहीं लगाई गई, जब सब मन की आंखों से उसके कपड़े उतारकर उसे निहार रहे थे। संन्‍यासियों तक को सब्र नहीं हुआ, भीतर बिग बास के बंगले तक बेटी बेटी करते घूम आए, और गूगल पर सर्च करके देखने से लाज नहीं आई। इस निर्लज्‍जता को क्‍या कहा जाए। जब घपले घोटाले करते हैं, सब माल समेट बेईमानी से घर और बैंक भर लेते हैं, उतनी बेईमानी तो नहीं की हमने। हमें चाहे हमारे छोटे से अपराध के लिए कित्‍ती बड़ी सजा दे दो, परंतु हमारे मनोरंजन के हक पर डाका मत डालो, मोबाइल जेब में डालकर जेल में ले जाने देना, उसमें 3 जी का कनैक्‍शन दे देना, चाहे उसकी फीस बिल में जोड़ देना। डाकुओं पर रोक लगाओगे तो ताउम्र पछताओगे। पर इतना जुल्‍म मत करना कि नार्मल फोन पकड़ा दो। आप क्‍या सोच रहे हैं पाठक बंधु कि इन्‍हें जेल में स्‍मार्ट फोन ले जाने दिया जाना चाहिए ?

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