अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

रात की कविता

>> रविवार, 18 दिसम्बर 2011

उमेठ तो दूं 
लेकिन किसके
कान
खता कान ने
तो नहीं की है। 

सपने बोये थे

सोते समय रात को
न जाने कौन
ज्‍यूस बनाकर
पी गया।

सुबह जागा

तो न सपने थे
न पास में अपने थे
सेबों की कौन कहे ?



अब आप ही बतलायें

किसकी कहें
किस्‍से किस से कहें
कैसे कहें
सो रहे हैं मित्र मेरे
सपने बेच कर।

पूछा तो कहने लगे

घोड़े अब
खरीदता कोई नहीं है। 

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