रात की कविता
>> रविवार, 18 दिसम्बर 2011
उमेठ तो दूं
लेकिन किसके
कान
खता कान ने
तो नहीं की है।
सपने बोये थे
सोते समय रात को
न जाने कौन
ज्यूस बनाकर
पी गया।
सुबह जागा
तो न सपने थे
न पास में अपने थे
सेबों की कौन कहे ?
अब आप ही बतलायें
किसकी कहें
किस्से किस से कहें
कैसे कहें
सो रहे हैं मित्र मेरे
सपने बेच कर।
पूछा तो कहने लगे
घोड़े अब
खरीदता कोई नहीं है।
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लेकिन किसके
कान
खता कान ने
तो नहीं की है।
सपने बोये थे
सोते समय रात को
न जाने कौन
ज्यूस बनाकर
पी गया।
सुबह जागा
तो न सपने थे
न पास में अपने थे
सेबों की कौन कहे ?
अब आप ही बतलायें
किसकी कहें
किस्से किस से कहें
कैसे कहें
सो रहे हैं मित्र मेरे
सपने बेच कर।
पूछा तो कहने लगे
घोड़े अब
खरीदता कोई नहीं है।



