छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं, छिपती नहीं हैं, छिड़ती नहीं हैं छिपकलियां
>> रविवार, 28 नवम्बर 2010
गोवा प्रवास के दौरान कविता : एक शब्द चित्र : चित्र सभी गूगल से साभार।
छिपकलियां बोलती हैं गोवा की
गोवा से
क्या बोलती हैं
जानता नहीं हूं
पर मैंने सुना है
टिक टिक टिक
जो सुनाई मुझे देता है
हर रोज रात को
पता नहीं क्या कहती हैं
वे मुझसे
या किटकिटाती हैं दांत
अगर वे दांत वाली हैं
क्या छिपकलियां
काट खाती हैं
क्या वे पढ़ रही हैं कविता
इससे कवयित्रियां
न हो जायें नाराज
वे छेड़ सकती हैं
मुहिम मेरे खिलाफ
वे कुछ भी कह रही हों
पर मुझे कविता सुनाई देती है
छिपकलियां तो नहीं छेड़ेंगी
मेरे खिलाफ मुहिम
कहीं मुहिम वैसी न हो
जैसी छिड़ी थी
या छेड़ी गई थी
छिनाल जंग
रॉय के खिलाफ
कालिया के खिलाफ
सब सबसे परिचित हैं
पर मुझसे नहीं
न मैं सबसे।
मैं छिपकलियों से परिचित हूं
छिपकलियां मुझसे नहीं
छिपकलियां छिनाल नहीं हैं
पर हो भी सकती हैं
छि से छिपकली
छि से छिनाल
और ....
छिड़ जाती हैं
छेड़ दी जाती है जंग
या छिड़वा दी जाती है
जंग जिसमें नुकसान ही होता है
पर होता है फायदा भी
वे जो जंग के हथियार बेचते हैं
जंग की खबरों पर
अपनी अपनी रोटियां सेंकते हैं
कुछ कोल्ड ड्रिंक भी पीते हैं
पीते हैं कुछ साफ्ट ड्रिंक भी
पर यह सच है
ड्रिंक सेका नहीं जाता
चाहे कोई सा भी हो
पर हॉट न हो
छिपकलियां छिपती नहीं हैं
साहित्य के समुद्र में जाल फैलाये
मछलियों को नहीं
छिपकलियों को फंसाएं
मछलियों के लिए कोई
मगरमच्छ नहीं लड़ता
छिपकलियों के लिए कोई
मगरमच्छ नहीं लड़ता
लड़ने के लिए सब लड़ते हैं
हारने के लिए कोई नहीं लड़ता
जीतते फिर भी सब नहीं हैं
एक को तो हारना ही होता है
और हारना हारना होता है
छिड़ना नहीं होता
छेड़ना नहीं होता।
भय के कारण नींद
छिपकलियों को भी नहीं आती
और वे दौड़ती रहती हैं
दीवार -दर- दीवार, दीवार- दर- छत
और उससे अधिक
दिमाग में
जबकि देख रही हैं
उसकी हर हरकत को आंखें
हकीकत को देख
डर रहा है मन
देह पर न आ गिरे
छिपकली गोवा की
जो सरकारी क्वार्टर की
चौथी मंजिल की छत पर
उल्टी लटकी, दीवार से चिपकी
भोजन के लिए करती जद्दोजहद
दो चार मच्छर मिलें
तो खा लूं
एक दो तितलियों को चबा लूं
क्राकरोच को डरा दूं
मच्छर टाइम पास हैं
मूंगफली की तरह
या कोई और कीड़ा
पर पीड़ा कहां हो रही है
यह जितने समझ रहे हैं
वे भय की राह के
पथिक हैं
सुनता हूं
पथिकों पर भौंकते कुत्ते गोवा के
रात में सूनी सड़कों पर
पर्यटकों का करते हैं इंतजार
पता नहीं वे दिन में भी भौंकते हैं
या नहीं
भौंकते होंगे
तो शहर के शोर में
उनको कोई सुनता नहीं होगा
वे देते रहते होंगे संदेश
भौंक भौंक कर, चीख कर
सब संदेश अनपहुंचे रह जाते होंगे
जिन्हें कुत्ते रात रात भर जागकर
भौंक भौंक कर भेजते रहते हैं
इसी समय, इसी पहर में
इस सृष्टि में
लेखक जाग रहे हैं
समन्वयन अनूठा है।







34 टिप्पणियाँ:
"छेड़ दी जाती है जंग
या छिड़वा दी जाती है
जिसमें नुकसान ही होता है
पर होता है फायदा भी
वे जो जंग के हथियार बेचते हैं
जंग की खबरों पर
अपनी-अपनी रोटियां सेंकते हैं
कुछ कोल्ड ड्रिंक भी पीते हैं
पीते हैं कुछ साफ्ट ड्रिंक भी"
'छि' से शुरू होकर भी 'छिपकली' 'छिनाल' नहीं होती। उसने गोवा में ही सही, आखिर आपकी कविता में जगह बना ही ली। अच्छी कविता है। 'छिपकली' पर ही 'छिनाल' से अलग कुछ-और कविताएँ रचो। गोवा की छिप'कलियों' का कुछ उद्धार हो जायेगा।
वास्तव में ही बलराम भाई
छिपी हुई कलियों की
खोज चहुं तरफ जारी है
बस कोई दीवार और
छत पर नहीं खोजना चाहता।
छिपलियों का अपना संसार, अपने कीड़े, हमारी व्यवस्था में कहाँ से आयेंगी। थोड़ी फेनी फैला दीजिये।
मैं छिपकलियों से परिचित हूं
छिपकलियां मुझसे नहीं
छिपकलियां छिनाल नहीं हैं
पर हो भी सकती हैं
सभी छिपकलियाँ छिनाल नहीं हो सकती ...... और सभी छिनाल छिपकलियाँ नहीं......
होना और न होना दोनों छ पर ही तो निर्भर है..
अमां अविनाश भाई बिना फ़ोटो के भी चल जाता ..
लिखा तो कमाल है ही आपने ..अदभुत ...
भाई यह कहां पे निशाना लगाया जा रहा है. ?
छिपकली-पुराण अच्छा लगा...
वैसे छिपी हुई खुशी की कलियों के बारे में आप का क्या ख्याल है...
जय हिंद...
छि से छिपकली
छि से छिनाल
छि से ही होता हैं छिछोरा भी
छिपकलियों का संसार कोई और भी देखता है, उनके चाल चलन पर भी टिप्पणी हो सकती है, ये तो छिपकलियों ने सोचा न होगा कभी।
छिपकलियां ये परवाह नहीं करती कि उन्हें छिनाल कहा जा रहा है या सचरित्र। अपनी दुनिया में खुश हैं वो, हमको भी यही सिखाती हैं।
और अजय भाई के लिये- चित्र बहुत सार्थक है, देखने की नज़र चाहिये।
छत से चिपकी छिपकलियां
सोचती रहती होंगी
कैसे हटूँ मैं यहाँ से
आखिर इस छत को मैंने ही तो सम्हाला हुआ है,
मेरे हटते ही ये छत भी गिर जाएगी.
कैसे हटूँ मैं यहाँ से.
छि - से ये सब होता है हमॆं तो अब पता चला ।
बेहतरीन कल्पना ।
हमारे में नजर की कमी ..गोया ये तो फ़िर से चशमा बदलवाने वाली बात हो गई ...चलिए आप सबको ऐसा ही लगता है तो फ़िर ठीक है ...
अर्थपूर्ण!!
छिपकलियों के लिए कोई
मगरमच्छ नहीं लड़ता
लड़ने के लिए सब लड़ते हैं
हारने के लिए कोई नहीं लड़ता।
AMAZING POEM AVINASH JI , JUST AMAZING.. BAHUT BAHUT DINO KE BAAD ITNI JABARDASHT POEM PADHI HAI ... JAB DELHI ME MILONG EAAP TO EK SALAAM DOONG AAPKO ..
VIJAY
एक गज़ब सोच फ़ोटो ज़रूरी है क्या
क्या एक..?
छिपी हुई कलियों को खिलाने के लिए गूगल का आदेश है कि मेरी फोटुओं का बिना किसी पूर्वग्रह के उपयोग किया जाए।
छिपकलियों का काव्य शास्त्र -लगता है लेखक ने भूख से बिलबिलाते या गोवा की फेनी में डूब घड़ियाल को छिपकली मान कर यह छिपकली कविता लिखी है ...
... vaah vaah ... kyaa baat hai !!!
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि कविराज श्री सतीश कुमार सक्सेना जी की कविता और उस पर डा. अनवर जमाल जी का कमेन्ट दोनों Comment pot में सुरक्षित कर लिए गए हैं .
देखिये निम्न पोस्ट -
जवानी दोबारा हासिल करने का बिलकुल आसान उपाय
http://commentpot.blogspot.com/2010/11/best-comment-no-3.html
यह तो बहुत ही बढ़िया पोस्ट रही!
--
कालान्तर में यह सन्तकोत्र के पाठ्यक्रम में शामिल हो सकती है!
बढ़िया पोस्ट के लिए बधाई !
बहुत बढ़िया रचना है गुरुदेव , नगर इस नज़र से समझूं यह नहीं समझ पा रहा ! हाँ अगर रचनाकार कोई और होता तो लिखता कि काफी दिनों बाद एक बेहतरीन रचना पढ़ी है !
सब आनंद मंगल है गोवा में ..गोवा कि छिपकलियों फेनी की शौक़ीन भी होती हैं सावधान !
अविनाश जी ,छिपकली के बारे में भी कोई इतना सोच सकता है ये तो हम ने सोचा ही नहीं था ,
वे जो जंग के हथियार बेचते हैं
जंग की खबरों पर
अपनी अपनी रोटियां सेंकते हैं
बिल्कुल सच कहा आपने ,पूरी कविता कुछ सोचने पर मजबूर करती है
वाह! बहुत बढ़िया... छिपती हुई कलियों का पुराण!
bahoot khoob,,,,,bahoot khoob
waah !
jai ho !
हमने मच्छरों के नाम एक पत्र लिखा तो पूरे परिवार ने मच्छरों का आतंक चखा.
अब आपने छिपकलीनामा लिखा...रब्बा खैर करे...
तो शहर के शोर में
उनको कोई सुनता नहीं होगा
वे देते रहते होंगे संदेश
भौंक भौंक कर, चीख कर
सब संदेश अनपहुंचे रह जाते होंगे
जिन्हें कुत्ते रात रात भर जागकर
भौंक भौंक कर भेजते रहते हैं
इसी समय, इसी पहर में
इस सृष्टि में
लेखक जाग रहे हैं
कमाल की कविता है जी। बिल्कुल बवाल करती सी...। लूट लिया आपने।
बहुत कुछ सीखा है इन छिपकलियों से, इसका भाग दो जल्द ही आने वाला है।
ब्रेक के बाद।
जाइयेगा जरूर, पर अन्य ब्लॉगों को पढ़ने और टिप्पणियां करने के बाद वापिस आइयेगा जरूर।
बेहतरीन कविता !
अविनाश सुपुत्र
चिरंजीव भवः
बहुत सुंदर प्रस्तुति
इस पोस्ट के संबंध में नीचे दी गई पोस्ट भी अवश्य पढ़ने के लिए विनम्र आग्रह है
यदि कोई व्यस्क सामग्री सीधे मेरे डैश बोर्ड पर आ जाये तो मै क्या करू , पाठक राय दे
लगता है इन छिपकलियों का गोवा से कोई संबंध है...क्योंकि किट किट किट गोवा में सुनाई दिया।
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