अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

देशी घी में चुपड़ी दो रोटियां

>> मंगलवार, 9 नवम्बर 2010

रोटियां ही रोटियां
देशी घी से परहेज
रोटियों को सहेज
दो रोटी का किस्‍सा
किसका कितना हिस्‍सा
गेहूं कैसा पिस्‍सा ?

सारा मानव जीवन पेट भरने के यत्‍न-प्रयत्‍न की जद्दोजहद है। जिसे आमजन से लेकर विशेषजन तक दो रोटी का जुगाड़ कहता है। जिस दो रोटी की बात की जाती है, वे दो नहीं, दर्जनों होती हैं और सिर्फ रोटियां ही नहीं, दाल, सब्‍जी, मिठाई, पानी की व्‍यवस्‍था और उन पर चुपड़ने के‍ लिए देशी घी की कॉम्‍बो स्‍कीम होती है। पानी इंसानी आंखों को भी मयस्‍सर नहीं है। दो रोटी आप अपने लिए चाहते हैं, पर यह नहीं बतलाते कि दिन में और जीवन में कितनी बार खाते हैं ?


आपने अपने हिस्‍से की दो रोटी तो गिना दीं, पर जो आपसे जुड़े हुए हैं, उनकी भी तो दो-दो गिनो। पत्‍नी, बेटी, बेटे (मां, बाप को चाहे मत गिनो) के लिए और कोई कुत्‍ता, बिल्‍ली, चूहा, खरगोश पाला हुआ है तो उसके लिए भी, पर यह सच है कि खाएं चाहे अधिक पर आप गिनायेंगे सबके लिए दो रोटी ही। आप जिन्‍हें दो रोटी बतला कर सस्‍ते में निपटा रहे हैं, वे दो रोटी, बीस-तीस रोटियों से कम नहीं हैं। फिर सिर्फ रोटी, दाल, सब्‍जी, मिठाई और पानी से ही जीवन खुशी-खुशी बीत जाए, यह भी पॉसीबल नहीं है।

उठते ही चाय भी चाहिए। आप पढ़ते हैं, इसलिए अखबार भी चाहिए। चाय या अखबार में से एक की भी छुट्टी करके देखिए, मुगली घुट्टी 555 का दिन भर सेवन करने के बाद भी आराम नसीब नहीं होगा। चाय चीनी वाली पीते हों तो बेचीनी मिल जाए और बेचीनी वाली पीते हों, चीनीदार मिल जाए तो स्‍वाद की मलाई तो पाकिस्‍तान पहुंच गई, समझ लीजै। फिर इसे कैसे मान लें कि ’’जीवन, तेरी यही कहानी, दो रोटी की है परेशानी’’।

जो खाएगा रोटी, कमाएगा रोटी, वो पहनेगा-पहनायेगा कपड़े भी। फिर कपड़े रखने-बदलने-पहनने-सुखाने के लिए घर भी चाहिए। दो रोटी बनाने के लिए रसोई और रसोई में रोटी बनाने के लिए पत्‍नी। रोटी बनायेगी पत्‍नी पर आपकी थाली तक रोटियां पहुंचायेंगे आपके बच्‍चे, उन सबके लिए रोटी, नहीं रोटियां। देखा आपने, दो रोटी कैसे सबको जोड़ती हैं, रोटियां प्रत्‍येक दिशा को मोड़ती हैं। बोलती कुछ नहीं, पर चुप नहीं रहती हैं रोटियां। पेट में न पहुंचें, तो पेट चिल्‍लाता है रोटियां। आप समझ लीजिए यह दो रोटी का सवाल – इतने सस्‍ते में हल नहीं होने वाला है, इसलिए ही तो दिवाली पर निकल गया सबका दिवाला है, सोच तो सब यही रहे थे कि मनाई दीवाली है। किसने मनाई, किसने मानी और किसकी मनी, यह खबर अब आने ही वाली है।

इंसान का दिन भर में एक-एक निवाला करके दिवाला निकल जाता है। पर कहता सदा यही है कि वो दो रोटी खाता है। किसी चीज की चाहत नहीं है, बस्‍स दो रोटी ही तो चाहिए। फिर यह कारें, कार्यालय, बाजार, महल, घर, दुकान, मॉल, असबाब, सिनेमा हॉल, रेल, हवाई जहाज, रंग-बिरंगे नोटों के अंबार किसके लिए हैं, वैसे क्‍या आप भी दो रोटी के जुगाड़ी ही हैं, सोचकर बतलाइयेगा ?

11 टिप्पणियाँ:

सतीश सक्सेना 9 नवम्बर 2010 3:13 pm  

देख तमाशा रोटी का ...

नरेश सिह राठौड़ 9 नवम्बर 2010 3:20 pm  

पेट सभी दुखो का कारण है | ना पेट होता नहीं कोइ समस्या पैदा होती |भगवान से कहना पडेगा अगले जनम मोहे पेट ना दीज्यो |

Tarkeshwar Giri 9 नवम्बर 2010 8:42 pm  

रोटी रे रोटी तेरी लीला हैं अपरम्पार
सब तेरे पीछे पड़े हैं,
सब कुछ छोड़ - छोड़ अपना घर -बार.

प्रवीण पाण्डेय 9 नवम्बर 2010 10:02 pm  

घी रोटी का सोंधापन, और क्या चाहिये जीवन को।

केवल राम 9 नवम्बर 2010 10:26 pm  

क्या कहूँ इस हालात में ...शुक्रिया

एस.एम.मासूम 9 नवम्बर 2010 11:57 pm  

बहुत सुन्दरता से दो रोटी की कहानी बाती है. आप का ब्लॉग स्वस्त ही नहीं अति स्वस्त है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा 10 नवम्बर 2010 11:59 pm  

सब इस रोटी की ही तो लड़ाई है...... या यूं कहें की चुपड़ी रोटी की :)

गुड्डोदादी 11 नवम्बर 2010 11:45 am  

पीठ तो रोटी नहीं मांगती मजदूर लोग इतना बोझा ढोतें है

mridula pradhan 12 नवम्बर 2010 12:14 pm  

bahut sahi chitran.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 12 नवम्बर 2010 5:32 pm  

रोटी सी सोंधी महक भीतर तक समा गयी। बधाई।

---------
मिलिए तंत्र मंत्र वाले गुरूजी से।
भेदभाव करते हैं वे ही जिनकी पूजा कम है।

डॉ. नूतन - नीति 20 नवम्बर 2010 11:02 pm  

दो रोटी के लिए वो भी घी की परहेज के साथ,,,भागती दौड़ती दुनिया में रोटी पे लिखा गया लेख … उम्दा

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