अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

अमिताभ बच्‍चन का अंगूठा

>> बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

डीएलए 27 अक्‍टूबर 2010

6 टिप्पणियाँ:

Pratik Maheshwari 27 अक्तूबर 2010 4:49 pm  

haha.. maza aa gaya..
anguthe aur anguli ke upar itna vichaar to kabhi bhi nahin kiya tha..
kaafi rochak raha..

aabhaar

anitakumar 28 अक्तूबर 2010 12:18 am  

अब हम तो अमिताभ की आवाज में ऐसे खोये कि अंगूठे राजा दिखे ही नहीं। अंगुली हो या अंगुठा दोनों के बिना जीवन अधूरा है फ़िर काहे का झगड़ा

बलराम अग्रवाल 28 अक्तूबर 2010 12:22 am  

दो अँगूठे सिर्फ उन्हीं के पास बचे हैं जिन्होंने,(गुरु) दक्षिणा नहीं दी।

प्रवीण पाण्डेय 28 अक्तूबर 2010 10:28 am  

सुन्दर विवेचना।

संगीता स्वरुप ( गीत ) 28 अक्तूबर 2010 11:53 am  

सूक्ष्म अवलोकन ...अच्छी प्रस्तुति

Udan Tashtari 31 अक्तूबर 2010 9:55 pm  

अमिताभ से पहले आप याद आ जायेंगे इस व्यंग्य के साथ.

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