अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

अमिताभ बच्‍चन राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार समारोह की रिहर्सल में

>> शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

पिछले दिनों खूब सारी व्‍यस्‍तता के बीच कल शाम को विज्ञान भवन सभागार में अमिताभ बच्‍चन जी से मुलाकात हुई तो सारी थकान कानों के रास्‍ते बाहर निकल गई। उन्‍होंने विज्ञान भवन सभागार में जब प्रवेश किया तो सीमित प्रवेश के बावजूद उनके प्रशंसकों की भीड़ लग गई। सब ही उनसे मिलने को आतुर। मैं भी उनमें से एक। वे  पुरस्‍कार विजेता ब्‍लॉक के एक कोने पर और दूसरे कोने पर मैं। बीच में अधिकतम 5 फीट का फासला।
अमिताभ भाई से मिलना सदैव एक रोमांचक अनुभव होता है। उनसे अब तक कई बार अनेक नेक अवसरों पर मुलाकात हो चुकी है। पर उनसे जाने कितने हजारों लोग रोजाना मिलते हैं ।
से तीसरे फारूख शेख
पिछली बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार प्राप्‍त करने अमिताभ जी, अमर सिंह जी के साथ थे और उनके साथ रास्‍ता बतलाता और बातें करता हुआ इसी सभागार में जब मैं आया था। उस समय इस दो मिनिट में खूब सारी बातें हुई थीं। मैंने उन्‍हें बतलाया था कि मैंने एक कविता लिखी है, जो मैं आपको देना चाहता हूं। उन्‍होंने कहा कि कार में ड्राइवर को दे देना। अब उनकी कार तक पहुंचना संभव नहीं था इसलिए वो कविता मैंने अपनी बेटी को दी और उसने वो आदरणीया जया बच्‍चन जी को दी थी। उन्‍होंने पढ़ी होगी अथवा नहीं। उन तक पहुंची भी होगी या नहीं।
अमिताभ जी जब रिहर्सल के दौरान कल जब मंच पर गए तो सभी उपस्थितों के हर्ष का पारावार उनकी बेपनाह  तालियों से निकलकर वातावरण को गुंजा गया। वे सदा की तरह ही प्रसन्‍नचित्‍त। जब मौका मिला तो मैंने उन्‍हें  प्रणाम निवेदित करते हुए बतलाया कि मैं एक हिन्‍दी ब्‍लॉगर हूं और अपना विजिटिंग कार्ड उन्‍हें दिया और मेरे कार्ड का सौभाग्‍य देखिए कि वो काफी देर तक अमिताभ जी के मोबाइल के बोझ को सहता रहा। जब उन्‍होंने मोबाइल उठाकर ट्विट किया तब मेरे विजिटिंग कार्ड को राहत मिली। उसके बाद उनके दोनों मोबाइल मेरे कार्ड के ऊपर विराजमान रहे। पर वो जरा न घबराया।
रिहर्सल के बाद जाते समय अमिताभ जी ने कार्ड को अपनी पैंट की दाईं जेब के हवाले किया। मालूम नहीं अब वो कहां पर होगा। मेरे विजिटिंग कार्ड के पास मोबाइल होता तो जरूर मुझे अपने अनुभव को बतलाता। खैर ... मैंने तो जितना अनुभव महसूस किया, आपको बतला ही दिया।
इसके बाद ज्‍योत्‍सना जी से उनकी संभवत: दूरदर्शन के लिए एक लंबी रिकार्डिंग हुई। जो अब तक प्रसारित भी हो चुकी होगी अथवा होने वाली होगी। मैं वहां मौजूद नहीं रह पाया और वापिस सभागार में आ गया था। कुछ चित्र जो मेरे स्‍पाइस मोबाइल QT 52 से लिए जा सके हैं, उनकी गुणवत्‍ता उतनी बेहतर न होने के बावजूद भी वे बेहतर हैं क्‍योंकि वे अपने फन में माहिर अमिताभ बच्‍चन जी के चित्र और वीडियो हैं। आप सब उन्‍हें उतना ही पसंद करेंगे।
video
शेष आज पुरस्‍कार समारोह वितरण समारोह से लौटने के बाद। वैसे आप इस 57वें राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार समारोह का जीवंत प्रसारण आज सांय 5 बजे से दिल्‍ली दूरदर्शन पर देख सकते हैं।

11 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला 22 अक्तूबर 2010 9:37 am  

बहुत बहुत बधाई। जरूर देखेंगे प्रोग्राम। आभार।

arun c roy 22 अक्तूबर 2010 9:45 am  

बहुत बहुत बधाई।

Narendra 22 अक्तूबर 2010 10:08 am  

Congratulation!!! i will try to see the show
Thanks & Plz keep in touch

संगीता पुरी 22 अक्तूबर 2010 10:30 am  

आपको बहुत बधाई !!

Suresh Chiplunkar 22 अक्तूबर 2010 12:39 pm  

बधाई हो, बधाई हो…

प्रवीण पाण्डेय 22 अक्तूबर 2010 4:00 pm  

सिनेमा के महामानव के साथ इतना समय बिताया आपने, हम सब धन्य हो गये यह सुन कर।

सतीश सक्सेना 22 अक्तूबर 2010 4:05 pm  

बधाई हो अविनाश भाई ! संस्मरण अच्छा लगा ! शुभकामनाएं !

सुरेश यादव 22 अक्तूबर 2010 4:23 pm  

अविनाश जी आप को बधाई आप की कविता भी ठीक जगह पहुँच गयी फिर से बधाई .

बलराम अग्रवाल 22 अक्तूबर 2010 10:22 pm  

आपको अमिताभजी के साक्षात्-दर्शन की बधाई। स्वप्न में तो हमने भी उनसे बातें की हैं। क्या ही अच्छा होता कि वह कविता भी आप इसी पोस्ट के साथ लगा देते।

अविनाश 22 अक्तूबर 2010 10:33 pm  

पोस्‍ट में अमिताभ भाई से मिलना
पर क्लिक करेंगे तो
खुद को कविता पर
पहुंचा हुआ पायेंगे
बलराम भाई।

Udan Tashtari 22 अक्तूबर 2010 11:25 pm  

इन्तजार रहेगा रिपोर्टिंग का.

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