बारिशरस में डूबी दिल्ली : डीएलए में पढि़ए
>> मंगलवार, 21 सितम्बर 2010
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जिन लोगों ने अपनी समझ के बूते यह शेखी बघारना शुरू कर दिया था कि दिल्ली से पेड़ काट डाले गए हैं, कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं, पर्यावरण की ऐसी की तैसी हो गई है, कहीं मिट्टी नहीं दिखलाई देती। सब जगह कोलतार की सड़कों, ईंटों और सीमेंट से अटी पड़ी हैं, इसलिए बारिश ने दिल्ली से किनारा कर लिया है। बारिश कई बरस, इन शेखी बघारूओं के साथ रही। आसमान पर बादल आते-जाते-गुजरते रहे और शेखी बघारू कहते रहे कि दिल्ली में पेड़ और हरियाली के न होने के कारण, बादल बारिश करने के बदले, कतराकर-शर्माकर गुजर जाते हैं।
दिल्ली भूल ही गई कि कभी यहां खूब बारिशें, कई-कई दिन लगातार होती थीं। शनिवार को लगी झड़ी अगले शनिवार तक जारी रहती थी। उन दिनों इतनी बारिशें सहज हुआ करती थीं। पर जब बारिशें बंद हो गईं, तो दिल्ली सचमुच में बारिश को भूल गई।
कॉमनवेल्थ गेम्स खेलों की दिल्ली में तैयारी शुरू हुई तो बारिश ने पहले तो औपचारिक निमंत्रण का इंतजार किया और पूरी जुलाई बेबारिश के बीत गई। बारिश ने दिल्ली को पराया नहीं समझा और यहां बनाये गये फ्लाई ओवरों, मेट्रो के जंजाल,स्टेडियमों को देखकर बारिश पर फिर से जवानी आ गई। बारिश अब षोडशी के मानिंद रोजाना छमक-छमक कर, मचल-मचल कर बरस रही है और दिल्ली का धुंआ उड़ा रही है। हर रंग में बरस रही है। यह बारिश का अपना एक अलग बारिशरस है।
लगता है, बादलों के पर्सनल कंप्यूटर में एरर आ गया और वो दिल्ली की लोकेशन में होने पर पांडिचेरी बतला रहा है और लगने तो यह भी लगा है, मानो बारिश कोई नेता हो गई है –चुनाव सिर पर हैं और उसे वोटों की चाहत है, इसलिए वो रोजाना पूरे जोर से खटखटा रही है। सोच रहा हूं कि दिल्ली में सीएनजी गैस के उपयोग का बढ़ता प्रभाव रूठी बारिश को मना वापिस लौटा लाया है। बढ़ता प्रदूषण सीएनजी गैस के प्रयोग के कारण काफी कम जो हुआ है। पैट्रोल, डीजल, कोयले की खपत में आई गिरावट अवश्य ही दिल्ली के पर्यावरण पर सकारात्मक असर दिखला रही है। फिर जो चश्मा बादल पहनते हैं, उसमें देखने पर कंक्रीट के जंगल, हरियाली शो कर रहे हैं, तो बादल बेचारे बारिश क्यों न करें, इसलिए खूब कर रहे हैं।
सितम्बर में भी बारिशों के कारण छातों और गर्मागर्म पकौड़ों की बढ़ती बिक्री बतला रही है कि बारिशें अभी देर तक बरसेंगी और कॉमनवेल्थ के संपन्न होने तक बरसती रहेंगी। आप तो भीगकर खुश हैं न ?





10 टिप्पणियाँ:
ाकेले अकेले ही सभी पकौडे खा रहे हैं दिल्ली वाले। बहुत बढिया। धन्यवाद।
बारिश रस में डूब रसपगी दिल्ली।
frs tvisit on a good blog.....aapko dhoondne me vaqt lga......sorry.
किसी मन्त्री की मुराद पूरी हो रही है।
बारिशरस में फिसल मत जाना!
अपना ख्याल रखना दिल्ली के वासियों!
बारिशरस ,
वाह वाह वाह तमाम रस तो सुने थे ,आज एक और....
कवि घाघ कह गये हैं-
शुक सनीच्चर आठो दिन
यानी शुक्र और शनि को शुरु हुई बारिश पूरे आठ दिन
बढ़िया लिखा है भई ।
वाह अविनास जी कूब बारिश करवा रहे हैं और पकोडे खा रहैं । जरा कलमाडी जी की तो सोचिये ।
हा हा हा अविनाश भाई क्या बात है लगता है कलम को डुबा डुबा कर लिखा है आपने ...हां बारिश में ही तो ..बहुत ही सामयिक व्यंग्य
Mansun aane main jara sa late hua tha, to log chillane lage ki kab hogi barish.
ab nipto beta , Ye krishna ka jamana nahi hai ki aakar ke Govardhan Pahad utha lenge
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