
झमाझम बरसती हुई बारिश की रिमझिम फुहारों का आनंद लेते हुए मैंने जब छाता नहीं ओढ़ा और मस्ती के मूड में निकला तो बारिश ने मुझसे बातचीत करने की इच्छा जाहिर की। उसे मालूम था कि मैं लेखक हूं और सीधा-सादा नहीं लिखता। मैंने बारिश से बातचीत के आमंत्रण को मौके की नजाकत समझते हुए स्वीकार कर लिया, जिससे वो मूसलाधार न बरस पड़े। रिमझिम वाले अंदाज में बातचीत शुरू हुई। बारिश ने बतलाया कि आपको याद ही होगा कि पिछले दिनों सरकार ने ऐलान किया था कि दिल्ली में गेम्स के अवसर पर चूहे नहीं रहने दिए जायेंगे, इसलिए मैं लगातार बरस रही हूं। जिससे जमीन में बिल बनाकर रहने वाले चूहे बाहर निकल आयें और सरेंडर कर दें। मैं उन चूहों की गारंटी नहीं ले रही, जिनके बैंक खातों तक मैं चाहकर भी नहीं पहुंच सकी और न उन पर छींटे ही डाल पाई। इस तहकीकात में मुझे किसी भी जमीनी बिल में एक भी चूहा-सांप-बिच्छू इत्यादि नहीं मिले हैं। मैंने पाया है कि वे सब एयरकंडीशंड गाडि़यों में सामने घूमते हुए भी छिपे रहते हैं। मैं बेनागा बरस कर सरकार की मदद कर रही हूं क्योंकि सरकार चाहती है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के मौके पर भिखारी भीख मांगने के लिए सड़कों पर न आएं। इससे गेम्स के दौरान भिखारियों की उपस्थिति न होने से भारत फख्र कर सकेगा और जिन भिखारियों को छाता लेकर भीख मांगने का आइडिया तक नहीं आया है। उनसे किसी और यूनीक आइडिए की उम्मीद करना बेमानी है अन्यथा वे अब तक भिखारी नहीं बने रहते और अपना कोई संगठन बनाकर रजिस्टर्ड हो लेते। सरकार के नगर निगम निकाय गलियों, सड़कों, नालों इत्यादि की सफाई नहीं करवा पा रहे हैं इसलिए मैं खूब बरस कर इन्हें अच्छी तरह धो कर चकाचक चमकाने की, मुझे न सौंपी गई जिम्मेदारी भी निभा रही हूं। जिससे विदेशियों को यहां की सुरक्षा व्यवस्था न सही, पर सफाई व्यवस्था तो पसंद आये। तालाब संस्कृति के विकास के लिए, सड़कों पर पानी भरकर मैं यह भी बतला रही हूं कि पानी की कमी का जो रोना रोया जाता है, वो सब फिजूल है। बारिशें न होने के कारण भी बेसिर-पैर के ही होते हैं। यह भ्रम से अधिक कुछ नहीं है कि जहां पर पेड़ होते हैं, वहां पर घनघोर बारिशें होती हैं। जहां भी फ्लाई ओवरों, स्टेडियमों और कंक्रीट की बहुमंजिली इमारतें का जाल-जंजाल होता है तथा खूब सारी कारें होती हैं। वहां पर मैं नहीं बरसती हूं। वो तो मैं बीते कई बरस समुद्र से, सूर्य से, बादलों से चैटिंग में बिजी रही हूं और आपने मुझे नदारद मान लिया। पर अब मैंने अपनी यह लत काबू में कर ली है और अपने बरसने के कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ संपन्न कर रही हूं और पिछली रही सही कसर भी अवश्य पूरी कर रही हूं। बारिशरस से लबालब बारिशरानी ने ऑफ द रिकार्ड यह भी बतलाया है कि बादलों ने स्वीकार किया है कि इन बारिशों में जो विदेशी हाथ है, वो सूखा है, जिससे उन कोई संदेह भी न कर सके।
8 टिप्पणियाँ:
हा हा हा बरखा रानी को भी चैट पे लगा दिया।
बिदेशी साजिश तो तगड़ी है दिल्ली डुबाने में।
हा हा हा धांसु ब्यंग्य है जी
राम राम
आनन्द आ गया.
आनन्द आ गया.
चूहे तो गोदामों में घुसे हैं, खूब अनाज मिल रहा है खाने को।
बहुत खुब जी मजा आ गया, धन्यवाद
जहाँ जहाँ जो भी छूट गया है, पानी भर देगा।
बारिश के मज़े खूब सुनाये आपने ।
बेहतरीन!बधाई.
एक टिप्पणी भेजें