अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

अदरक के स्‍वाद पर एक नया मुहावरा बतलायें (अविनाश वाचस्‍पति)

>> रविवार, 21 मार्च 2010

एक कुत्‍ता अदरक खाने की कोशिश कर रहा था। उसे बार बार देख रहा था। जीभ से चाट रहा था। उलट पलट रहा था पर सुलट नहीं पा रहा था। उसकी खुशबू उसे सतर्क कर रही थी। लग तो हड्डी का टुकड़ा रहा था परंतु रंग ब्राउन। शायद कृत्रिम हो आदमी ने बनाया हो। विचार मग्‍न उसी में पूरी शिद्दत से जुटा हुआ था।
उसका मित्र एक बंदर वहां से गुजरा तो कुत्‍ते को अदरक से धींगा मुश्‍ती करते देख रूक गया। बंदर को रूकता देख कुत्‍ते ने जानना चाहा तो बंदर ने कहा कि यह नॉनवेज नहीं है।
कुत्‍ते ने पूछा पर इसका स्‍वाद ....
बंदर ने बतलाया मैं ही नहीं जान पाया। लगता है तुम अनपढ़ हो। इतनी शिक्षा तो ली होती। हिंदी कोर्स में एक मुहावरा बहुत प्रचलित है 'बंदर क्‍या जाने अदरक का स्‍वाद'

तो इस समय बंदर और अदरक दोनों तुम्‍हारे सामने हैं। अगर कोशिश करके तुम अपने इस प्रयास में सफल हो जाते हो तो एक नया मुहावरा हिंदी जगत को मिल जाएगा 'कुत्‍ता ही जाने अदरक का स्‍वाद'। नहीं सफल हुए तो 'बंदर कुत्‍ता कोई न जाने अदरक का स्‍वाद'। मेरी जमात में वृद्धि हो जाएगी।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि उस कुत्‍ते की तलाश करें और उससे अदरक का स्‍वाद जानने का प्रयास करें और एक नया मुहावरा हिन्‍दी जगत को देकर कृतार्थ हों।

13 टिप्पणियाँ:

M VERMA 21 मार्च 2010 5:24 पूर्वाह्न  

मिल गया ------- मिल गया
वह कुत्ता मिल गया. उसने बता दिया अदरक का स्वाद --
मीठा, खट्टा, तीखा --------- इन्हीं में से कोई एक है.

संजय भास्कर 21 मार्च 2010 6:51 पूर्वाह्न  

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर 21 मार्च 2010 6:51 पूर्वाह्न  

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

राजीव तनेजा 21 मार्च 2010 7:47 पूर्वाह्न  

अदरक ही जाने कुत्ते का स्वाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 21 मार्च 2010 7:59 पूर्वाह्न  

बन्दर की जात, अदरख का स्वाद!

विनोद कुमार पांडेय 21 मार्च 2010 8:16 पूर्वाह्न  

कुत्ते ने अभी हार कहाँ मानी...जब तक हार ना मान ले मुहावरे में कुछ चेंज मत कीजिए...बढ़िया मजेदार प्रस्तुति

राज भाटिय़ा 21 मार्च 2010 2:14 अपराह्न  

पहले यह बताये आप को कुत्ते ओर बंदर की बात केसे समझ मै आई, फ़िर आप को केसे पता है कि वो अदरक ही है??

वन्दना अवस्थी दुबे 21 मार्च 2010 6:52 अपराह्न  

मुद्दा तो अच्छा है लेकिन मुहावरा सूझ ही नहीं रहा. कविताई में कमज़ोर हूं न.

मनोज कुमार 21 मार्च 2010 7:16 अपराह्न  

बंदर और कुत्ता दोनों थे गंजे,
भाग गए देख अदरख के पंजे!!

डॉ महेश सिन्हा 21 मार्च 2010 8:50 अपराह्न  

अदरक क्या जाने कौन बंदर कौन कुत्ता

शेफाली पाण्डे 21 मार्च 2010 11:44 अपराह्न  

ye munh aur adrak ka swad...

हिमान्शु मोहन 24 मार्च 2010 1:30 अपराह्न  

कुत्ता तो नहीं मिला, बात समझ आ गई-
अदरख - खाए तो मानुष,ना खाए तो मंकी, खाऊँ न खाऊँ करे तो कुत्ता

हिमान्शु मोहन 24 मार्च 2010 1:32 अपराह्न  

………और हर बात पे बोला सो बोलागर

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