1411 - अब मैं रिक्शा खरीद ही लूं (अविनाश वाचस्पति)
>> शुक्रवार, 19 फरवरी 2010

सोच रहा हूं ऑफिस आने जाने के लिए एक रिक्शा खरीद ही लूं। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और अतिरिक्त आय की संभावना भी बनेगी। अब अगर वेतनभोगी होगा तो दुतरफा लाभ को ध्यान में रखेगा ही। जब तक टू-व्ही्लर था तब तक जिनको भी लिफ्ट देता था, नि:शुल्क ही छोड़ता रहा हूं। बाद में जब हेलमेट की अनिवार्यता हो गई तब भी एक अतिरिक्त हेलमेट साथ रखता था। महिलाओं के मामले में तो हेलमेट की जरूरत ही नहीं रही, कुछ दिन हंगामा मचा भी परन्तु फिर ऐसा शांत हुआ कि अब कोई हलचल नहीं बची है। हलचल अब चारों तरफ सिर्फ जाम की बाकी है। वाहन नये फ्लाईओवरों के आसपास खूब छलक रहे हैं। खैर ...
बाद में एक सैकेंड हैंड कार खरीदने का जुगाड़ कर लिया और उसमें सीएनजी किट लगवा ली। वो भी तीन साल खूब दौड़ाई सिर्फ आफिस से घर या घर से आफिस तक ही नहीं। उसमें आगरा, रोहतक, रिवाड़ी, पानीपत, ग्रेटर नोएडा तक घूम फिर आता रहा। बाद में लोन लेकर एक नई इंडिका ले ली, वही मुझे ढो रही है अब, या यूं कहिए कि मैं ढो रहा हूं। कारण मेरे पाठक बेहतर जानते हैं। उसमें भी लिफ्ट फ्री में ही देता हूं जिसमें हेलमेट की जरूरत भी नहीं होती है।
जब पुरानी कार बेच दी थी और नई नहीं ली थी उस अवधि में, क्योंकि अपना पुराना स्कूटर भी प्रयोग में न आने के कारण बेच चुका था, तब सोचा था कि घर से ऑफिस की दूरी इतनी कम है कि साईकिल से भी आया जाया जा सकता है परन्तु साईकिल चालकों की होती दुर्गति और उस पर भी सड़क पर उन्हें न मिलती सुरक्षित साईकिलडंडी (पगडंडी की तर्ज पर)के अभाव में हिम्मत नहीं कर पाया। वैसे भी जब बगल से अपनी पूरी ताकत से कारों, मोटर साईकिलों के बजबजाते हॉर्न के एक तरफ से भी गुजरता हूं तो यकबयक गुजरने का अहसास होने लगता है और मैं भीतर तक सहम जाता हूं। सो साईकिल खरीदने की हिम्मंत नहीं कर पाया और कार खरीदने की हिम्मत न होते हुए भी बैंक से ऋृण लेकर कार खरीद ही ली और उसमें सीएनजी भी लगवा ली।
पर जब से दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय सुना है तब से विचार कर रहा हूं कि एक अदद रिक्शा मैं भी खरीद ही लूं फिर मुझे तो खुद ही चलाना है जबकि न्यायालय ने तो यह भी कहा है कि जब कोई किसी की गाड़ी चला सकता है तो रिक्शा क्यों नहीं ? और मैं भी माननीय न्यायालय के इस जनहितकारी रवैये से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं। इस नये निर्णय से रिक्शों के संबंध में कुछ नई नीतियां अवश्य ही लागू की जाएंगी जिनसे रिक्शा चालकों को लाभ मिलेगा। आप इंसानों की बढ़ती संख्या तो रोक नहीं पा रहे हैं पर रिक्शों को सड़कों पर चलने से रोकना चाहते हैं। जब वाहनों का जाम लगना ही है तो रिक्शों को क्यों दलित मानकर उन्हें हटाने की मानसिकता बन रही है या बनाई जा रही है। जाम का पूरा मजा उठाना ही आधुनिकता में पुरातन की जुगलबंदी है।
रिक्शा चलाने पर यह तो होगा ही कि जो बैठेगा वो किराया अवश्य ही देगा क्योंकि कार, स्कूटर चालक के सम्मान पर किराया लेने से ठेस पहुंचने की संभावना बनती है परन्तु रिक्शा चालक को किराया देने और उसके लेने पर ऐसी कोई संभावना सिरे से ही नहीं बनती है क्योंकि सम्मान होगा तो ठेस पहुंचेगी। जबकि रिक्शे में न तो पेट्रोल और न गैस ही ईंधन के तौर पर खर्च होगा तो इसमें मुनाफा भी अच्छा रहेगा। कम से कम नौकरी में मिलने वाले ओवरटाइम से तो अधिक ही मिल जाया करेगा और इसे सुबह घर से जल्दी निकल कर और देर से लौटकर और भी अधिक बढ़ाया जा सकता है। मतलब अगर मेहनत करूंगा तो लक्ष्मी अवश्य ही विनत होंगी। (आयकर विभाग इस पर कर लगाने के बारे में न ध्यान दे तो साहस करूं ?)
रिक्शों के चलने से पर्यावरण को अगर फायदा नहीं होता है तो नुकसान भी नहीं होता है। हां, अपराधों में अवश्य कमी आती है। अपराध में कमी इसलिए आती है कि यदि आदमी अपने पेट भरने के लिए रोटी का जुगाड़ ही नहीं कर पायेगा तो आजीविका के तौर पर लूटने को ही आजीविका बनाने के लिए विवश होगा। जिससे अपराध तो बढ़ेंगे ही। वैसे मैं यहां पर यह भी स्पष्ट कर दूं कि रिक्शा चलाना कोई आसान काम नहीं है, वो बात दीगर है कि इनके चलाने के लिए ड्राईविंग लाईसेंस की अनिवार्यता अभी तक तो नहीं है परन्तु पब्लिक और पुलिस दोनों के द्वारा रिक्शाचालकों के साथ रोजाना की जाती बदसलूकी जरूर इस धंधे को अपनाने में एक बहुत बड़ी बाधा है। पब्लिक दस की जगह दो रुपये देकर ही काम चलाना चाहती है और पुलिस देना तो दूर, जो मिलता है उसमें भी हथियाने को तैयार रहती है बल्कि हथिया लेती है।
पुलिस की डंडाक्रेसी (डेमोक्रेसी की तर्ज पर) से पीडि़त रिक्शाचालक तो टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर, फोर-व्हीलर और सिक्स व्हीलर की हिकारत भरी नजरों से भी यहां वहां जब तब सब ही घायल होते रहते हैं। उनकी संख्या बहुत कम है क्योंकि इनकी संख्या भी कम है जो इनको चाहते हैं, वे जो इनमें सफर करके सफरर होने से बचे रहते हैं। वैसे अब जब उच्च न्यायालय जाग गई है तो अन्य विभाग भी कब तक सोते रहेंगे, वे रिक्शों पर दो से अधिक सवारी बैठाने पर चालान या रिक्शा जब्ती इत्यादि का प्रावधान करके ही मानेंगे। नगर निगम तो ऐसा करती ही रहती है, चाहे नियम हो अथवा न हो। उनका चाहना ही इनके लिए कड़ा नियम हो जाता है जिसमें सड़ना रिक्शाचालकों की मजबूरी है। तो आपको क्या लगता है कि मुझे रिक्शा खरीद लेना चाहिये अब या ... ?
वैसे डर भी लगता है रिक्शाचालकों को हर तरह से पीडि़त होते देखकर परंतु इसमें माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के सक्रिय दखल और हालिया निर्णय के बाद सकारात्मक विकास की आशा जगी है।




32 टिप्पणियाँ:
aeisi baaten kam padhne ko milti hain... aabhaar aapka
arsh
अविनाश जी-डंडाक्रेसी ने देश की नैया डुबो दी है।
रिक्शा लेने के बाद भी चलान तो भरना ही पड़ेगा।
अब तो पैदल चलने वालों के चलान कटने लगे हैं।
बहुत गंभीर समस्या की ओर आपने ध्यान दिया। आभार
hहुम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म तो अब ब्लागर्ज़ रिक्शा चलायेंगे ? अविनाश भाई ऐसा मत करें हम जैसे मोटे लोग कहाँ चला पायेंगे? आटोरिक्शा होता तो और बात थी। शुभकामनायें
दिमाग में घंटी बज गई है जी
आयडिया मुझे तो अपने लिये अच्छा लगा, परन्तु मुझे पार्किंग की समस्या विकट दिख रही है। मेरा आफिस दूसरे माले पर जो है।
प्रणाम
आपने देर कर दी आपको बहुत पहले ही रिक्शा खरीद लेनी चाहिए थी ..कोई बात नहीं देर आये दुरुस्त आये "
लेकिन मै यक़ीनन कह सकता हूँ की आप खरीदेंगे नहीं
देर किस बात की ,
लीजिए खरीद फटाफट,
हमको भी लेकर चलियेगा,
फायदा आपका भी होगा और हमारा भी,
ब्लोगर मिट भी कर लेंगे,
कुछ बातें भी वहीं करलेंगे ,
तो फटाफट ले ही लिजिए ।
बहुत खूब !!
अबिनाश भाई एक डिस्क्लेमर भी
अगर चालक रिक्शे पर मौजूद नही है और सवारी को जाना हो तो एस एम एस या ई मेल से सन्देश भेजके बुलाया जा सकता है तब तक सवारी रिक्शे पर बैठ कर एफ़ एम सुन सकती है
बढ़िया आइडिया है. ....मुझे पता है अब आप कल एक पोस्ट डालेंगे ..''कौनसी रिक्शा लूं?" :D
ख़याल तो आपका अच्छा है ग़ालिब! लेकिन ज़रा पता कर लीजिए कि जिस रास्ते पर आप रिक्शा चलाना चाह रहे हैं, उस पर रिक्शा चलाने की अनुमति है भी या नहीं. वरना अगर बाद में दिल्ली पुलिस की डंडोक्रेसी के शिकार हो जाएं तो टिप्पीकारों को दोषियाइएगा मत.
ग़ज़ब का ....
एक आइडिया जो बदल दे दुनियाँ!!
हूं..खयाल तो अच्छा है, लेकिन पहले रिक्शा-संघ से अनुमति ले लीजियेगा.
बहुत अच्छा विचार है ...फिर रिक्शे के पीछे ..कोई नया शेर या नई पोस्ट का URL भी लिखा जा सकता है .:).
बहुत अच्छा विचार, लेकिन रिकक्षा के साथ साथ एक बधिया सा पिस्तोल भी खरीद ले.... ओर जो किराया देने मै आना कानी करे... उसे सीधा ऊपर का टिकट कटवा दो, ओर हां ओफ़िस समय मै किराये पर दे दो, बस यह बहुत अच्छा रहेगा, ओर बिमारिया भी नही लगेगी, अजी जब रोज दो सवारियो को बिठा कर खींचो गे तो ऎसे आदमियो के पास बिमारियां भी नही आती, यानि एक रिकक्षा ओर बहुत से लाभ... आप शुरुआत करे, फ़िर सब ब्लांगर भी एक एक रिक्क्षा डाल लेगे.
हमारी शुभकामनाये
आईडिया बुरा नहीं है। इस में आमदनी और लोकप्रियता दोनों हैं। लेकिन सफेदपोशी जाने का खतरा भी है। और खतरे तो उठाने ही होंगे अगर कुछ हासिल करना है।
avinash ji
aap aage aage chaliye hum sab aapke sathhain.......matlab aap lijiye phir hum bhi le lenge aur bloggers association rikshaw union use naam denge..........bahut hi umda dhang se aapne is samasya ko uthaya hai.
बहुत खूब !!! नेक काम में देरी क्यों? जल्दी लीजिये रिक्शा.....और हर एक सवारी के अनुभव बाँटनें के लिए एक और ब्लॉग शुरू कीजिये "रिक्शे-वाला ब्लॉग".....
प्रणाम!
इस विचार का स्वागत है!
बढ़िया सवारी है!
हैदराबाद के मेरे कुछ मित्र वहां के सबसे भीड़भाड़ वाले इलाके में काले शीशों वाली कार ले जाकर ट्रैफ़िक में सटा देते हैं फिर रेंगते ट्रैफ़िक में आराम से सुरापान करते रहते हैं. इस प्रक्रिया को वे 'कारोबार' ( car-o'-bar ) कहते हैं.
रिक्शातंत्र के चलते बस दिल्ली में भी वे दिन आए जी जानो कि हर सड़क पर कारोबार चल रहा होगा.
सुझाव आपका स्वागत योग्य है ...उसके और क्या क्या उपयोग होसकते है वो भी प्रस्ताव अच्छे मिल गए टिपण्णी के माध्यम से :)
सादर
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
बहुत सही सोचा है आपने कुछ फ़ायदा आगे हो तो बताइएगा...और भी बहुत लोग सोच रहे है बस यही सोच रहा हूँ कि कोई बड़े लोग का मार्गदर्शन मिले तो धंधा फ़ायदे वाला हो जाए....मजेदार व्यंग....बहुत अच्छा लगा चाचा जी...बधाई
अविनाश जी ,रिक्शे पर आप की इतनी मेहरवानी ,कहीं चुनाव तो नहीं लड़ने जा रहे हैं.
साईकिलडंडी, डंडाक्रेसी …वाह बढ़िया शब्द सीखने को मिले।
एक फ़ायदा तो आप भूल ही गये। हमें एक्सरसाइज सायकिल भी नहीं लेनी पड़ेगी। घर में जगह भी बचेगी और टाइम भी। काम पे जाना और एक्सरसाइज साथ साथ्। है न?
बचपन मे यह नही कहा गया क्या ..अच्छी तरह से पास होगा तो साइकल मिलेगी वरना रिक्षा.... हाहाहा
इरादा बुरा नहीं!!
प्रस्तुति बढ़िया है .रिक्सावालों पर छापा भी नहीं पडता है .
अविनाश जी
अब क्या क्या किया जाए........!
हमेशा की तरह धारदार व्यंग्य।
'संवाद सम्मान' हेतु हार्दिक बधाई।
Holi mubarak ho!
ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए आपका यह प्रयास प्रशंसनीय है.
sahi hai ...
kuch samay baad vaise bhi petrol diesel khatm hone vala hai...
phir riksaw aur cycle....
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