अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

आइये दिल्‍ली की झांकी यहां पर देखें : गणतंत्र दिवस पर नहीं दिखाई जा रही है

>> मंगलवार, 26 जनवरी 2010



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हरिभूमि

12 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी 26 जनवरी 2010 10:54 am  

याद रखूंगी !!

Vivek Rastogi 26 जनवरी 2010 11:15 am  

ये रही हमारी झांकी, मतलब कि टिप्पणी।

अभिषेक प्रसाद 'अवि' 26 जनवरी 2010 11:29 am  

kya khub likha hai sir aapne... dilli ka dil najar aa gaya... yaad ho aayi mujhe meri apni dilli...

SACCHAI 26 जनवरी 2010 2:11 pm  

" bahut hi badhiya likha hai sir ...ab hamari baaari to ye rahi hamari tippany ki jaanki."

----- eksacchai { AAWAZ }

डॉ महेश सिन्हा 26 जनवरी 2010 2:32 pm  

लीजिये
उपस्थिति दर्ज

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 26 जनवरी 2010 5:58 pm  

गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

नया वर्ष स्वागत करता है, पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना, है गणतंत्र महान ॥

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी 26 जनवरी 2010 9:59 pm  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति....आप को गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें....

राज भाटिय़ा 27 जनवरी 2010 12:36 am  

गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाऎँ
आप की सारी झाकियां पढी, सत्य है
धन्यवाद

राजीव तनेजा 27 जनवरी 2010 1:07 am  

लगे रहीं..जमे रहें...डटे रहें

प्रवीण शाह 27 जनवरी 2010 9:39 am  

.
.
.
सुन्दर आलेख,
आभार!

Ram Shiv Murti Yadav 1 फरवरी 2010 10:55 am  

Bahut khub...

RaniVishal 6 फरवरी 2010 6:55 am  

kub likha haiji aapne ......is rachana ke madhyam se jivan ka adhyatma bhi aur bhotikta bhi dono hi se milwaya hai...Aabhar!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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