क्या संसद पर बाजार का असर छा रहा है ...
>> रविवार, 20 मई 2012
संसद भी एक बाजार है। आजकल उसे सजाया जा रहा है।
एक बाजार लोक के लिए है लेकिन इंटीरियर का काम राज्यसभा के लिए किया गया है। संसद
में चीयर्स गर्ल्स का जिक्र सुनकर आप चौंक जाएंगे। वैसे भी चौंकना अवाम के लिए
जरूरी है। अभिनेत्री रेखा को कभी न जन की चिंता रही है और न कभी जन जन से जुड़े सरोकारों
की। सेलीब्रिटीज का काम यूं ही चल जाता है। एक खिलाड़ी है जिसे दौड़ाया गया है
राज्यसभा की ओर क्योंकि दौड़ना क्रिकेट की फितरत है। फिक्सिंग के लिए दौड़ना,
काली कमाई के लिए क्रिकेट में घोड़ों को खोलना है। दौड़ना सिर्फ दौड़ना है। दौड़
शुरू होती है और यकदम से भागमभाग में बदलती हुई दिखाई देती है। बाल फेंकने से लेकर
रन के लिए दौड़ने का नंबर टीम में शामिल दौड़ में विजयी होने पर ही आ पाता है। जो
विजयी होता है, वह फिर सभी प्रकार की दौड़ में पारंगत हो जाता है। पैसों के लिए
दौड़ प्रमुख हो जाती है।
पहले सजना फिर दौड़ना। फिर संसद में बैठकर आपस
में बोलते हुए सिरों को फोड़ना – इतना सरल नहीं है, इसे संसद में शक्ति-प्रदर्शन
कहा जाता है। आसान तो फिक्सिंग भी नहीं है लेकिन क्या संसद में रेखा नहीं खींची
जानी चाहिए, सो खींच दी गई। अब इसमें भी आपत्तियां सामने आ रही हैं। आपत्ति करने
का कार्य सबसे सरल है, इसे विरले नहीं करते लेकिन सब कर सकते हैं। फिर भी शुक्र है
कि सब नहीं करते हैं। कुछ करके माफी मांग लेते हैं क्योंकि वे माफी मांगने के लिए
सब उपक्रम करते हैं। यह बाजार का मन पर छाया आधिपत्य है। फिर भी क्या रेखा को
राज्य सभा और सचिन को इस सभा में दौड़ने के लिए कहना कठपुतली का खेल तो नहीं कहा
जा सकता है।
दौड़ सिर्फ शिखर के लिए ही नहीं होती है, डर के
कारण भी दौड़ा जाता है। अनेक बार न दौड़ने वाला भी शिखर पर दिखाई देता है। इसे फिक्सिंग के जरिए शिफ्टिंग कह सकते हैं। शिफ्ट करने के लिए आजकल मजबूरों और
मजदूरों की नहीं, लिफ्ट की जरूरत रहती है। राज्यसभा में सीट पक्की करना न लिफ्ट
है, न शिफ्ट है, न फिक्स है – यह गिफ्ट है। गिफ्ट किसने किसे दिया है। गिफ्ट यानी
उपहार – यह बिग हार है, शिखर पर पहुंचने के समान है। हार होकर भी हार में सबसे
बड़ी जीत है। यही आज के बाजार की रीत है। सब इसी से प्रीत कर रहे हैं। घर, जेबें,
महत्वाकांक्षाएं मन की पूरी कर रहे हैं।
संसद जिसमें अब बत्ती सिर्फ आती ही नहीं है, जाती
भी है। सुगंध जाए, मत जाए लेकिन दुर्गंध घुसी चली आती है। यश और सत्ता के शीर्ष
पर पहुंचाती है। शीर्ष पर पहुंचना शीर्षक बन रहा है। हर्ष ही इस खेल का उत्कर्ष
है। यहां पर रन नहीं बनाए जाते हैं। कई तो यहां पर बेइंतहा ऊधम मचाकर भी शीर्षक बन
जाते हैं। जोरों से चिल्लाते हैं। अपनी कहने को बौराते हैं, दूसरों की सुनना नहीं
चाहते क्योंकि कान पक जाते हैं। यह बौराना सत्ता का पागलपन है। इसी पागलपन में
छिपा अपनापन है। यही सपना था जो अब वास्तविकता है। तय है, सपने सपने ही रह जाते
हैं जो दूर नहीं दिखाई देते हैं। वह भी वास्तविकता के जगत में जमे नजर आते हैं।














सुदामा जी ,लेखक एक प्रकाशक को बनाता है,प्रकाशक एक लेखक को नहीं ,अगर मुझे अपनी ही पुस्तक की मात्र १०० प्रितियाँ आप लागत मूल्य पर उपलब्ध ना करवा पा रहे हैं ,तो घाटे में आप हैं ,अभी कुल मिला कर आपके प्रकाशन में ५-६ पुस्तकें ही हैं ,जिन १०० प्रतियों की माँग अविनाश जी ने आपसे की ,वह अवश्य ही प्रब्बुध जनों के द्वारा पठित होती ,जिनमें कुछ लेखक भी हो सकते थे , मीडिया के लोगों को मुफ्त में प्रतियाँ बाटने में आपको उज्र नहीं ,क्योंकि आपको खबर खरीदनी थी ,और चतुराई से सौदा किया आपने |
एक दिन पूर्व ही जावेद अख्तर साहब के पुस्तक का विमोचन हुआ ,महफ़िल जमी बाकायदा,और आप धंधा करने की बात करते हैं ,पर पानी अफोर्ड नहीं कर सकते ,मुझे बोलने दीजिए आप उस लायक नहीं की की इस पावस कार्य को कर सकें |
अगर आप इतने दरिद्र थे की अतिथिओं का नुय्न स्वागत आपके बस की बात नहीं थी ,तो पूर्व में इसकी सूचना लेखक को दे सकते थे ,प्रकाशन अधिकार हाथ में आते ही आप दरिद्र -नारायण की सूची में कैसे शामिल हो गए ?
अंतिम बात शिवम जी के लिए -आप चाहते हैं की इन तथ्यों को गोपनीय रखा जाये ,तो समाज में घटित -अघटित तथ्यों पर टिपण्णी का कोई अधिकार नहीं आपको ,क्यों लिखते हैं दिल्ली में हो रहे किसी अन्य के शील -हनन के विरूद्ध ,जब स्वयं के शील -भंग होने पर बोलने की शक्ति आपमें नहीं है ,
मैंने पहली बार एक साहित्य -जीवी को गुंडों की भाषा का प्रयोग करते देखा है ,अगर विष-वमन की इच्छा किसी में हो तो मतलब साफ़ है विष आपके गले में ही नहीं ,पूरे शरीर में फ़ैल चुका है,तो इलाज की ज़रूरत आपको है ,गेट वेल सून !
होली का पर्व आपको मंगलमय हो! बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
जारी....
एक और बात, आपके प्रकाशक आपको इस बात के लिए भी भ्रमित कर रहे हैं कि पुस्तक पर 28000 रूपये की लागत आई है. आपकी पुस्तक मैंने देखी है. यदि पेपरबैक में उस पुस्तक की लागत का आकलन किया जाये तो भी 500 प्रतियों के लिए 20000 रूपये से अधिक की लागत नहीं आती. आप तो जानते ही है कि मैंने 'युवा साहित्य चेतना मंडल' के माध्यम से अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित की हैं. जिससे स्पष्ट है कि मुझे पुस्तक के प्रकाशन की पूर्ण जानकारी है.
रही बात, पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर खान-पान की व्यवस्था की. यह तो लेखक और प्रकाशक दोनों पर निर्भर करता है कि इसकी व्यवस्था कैसे की जाये. वैसे मुझे लगता है कि लेखक और प्रकाशक आपसी सहमति पर इस व्यवस्था को कर सकते थे. इसके लिए प्रकाशक का अपने आपको 'सुदामा' जैसे विशेषण से संबोधित करना मुझे उचित नहीं लगा. अरुण चंद्र जी इसके माध्यम से हिंदी वालों को सुदामा सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं. अरुण जी, मेरी कई पुस्तकें बिना रोयल्टी के प्रकाशित हुई है और जब भी मुझे आवश्यकता होती है प्रकाशक मुझे पुस्तकें देने के लिए कभी मना नहीं करते. और जो पुस्तकें रोयल्टी पर हैं उसका उसके लिए प्रकाशक ने नियमित रूप से मुझे भुगतान भी किया है. इतना ही नयी इसके अतिरिक्त लोकार्पण, समीक्षाओं और मीडिया के लिए भी वे मुझे पुस्तक देने के लिए कभी मना नहीं करते. यही कारण है कि मेरी एक ही प्रकाशन से लगभग ८ पुस्तकें आ चुकी हैं. यह लेखक और प्रकाशक के बीच मधुर संबंधों का ही परिणाम है. जबकि कई अन्य बड़े प्रकाशक मुझसे मेरी पुस्तकों के लिए आग्रह कर चुके हैं.
जारी....
खैर जो भी हो, इस विवाद का अंत चाहे जिस मोड़ पर हो लेकिन लेखक को उसके अधिकारों से वंचित रखना ठीक नहीं है. यदि प्रकाशक बाज़ार में बैठा है तो उसे पुस्तक के लेखक को भी बाजार से प्राप्त लाभ का प्रतिशत देना ही होगा. हमारा संविधान भी सभी के मौलिक अधिकारों की बात करता है तो लेखक का भी यह मौलिक अधिकार है कि उसकी मेहनत का फल उसे मिले.
Chander Prakash Mishra · 17 परस्पर मित्र
hindi ke publisher royalty dene mein aanakani karte hein. books ki sahi kharid ki soochna bhi nahin dete. lekhak ke dum par apna jeevanyapan karte hein aur us ka he haq marte rahte hein aur phir nai kitab bhee mangte hein. mana karne par bhi apni marzi se kitab ke naye sanskaran nikal lete hein. is par roke lagni chhayie. aapne sahi likha hein ki lekhak ki marzi ke bina prakashak ko doosra sanskaran chhapne ka haq nahin hein. aise prakashako ki dookane band karva deni chhayie. ye sarkar ko bhi dhokha dete hein aur lekhak ko bhi. phir bhi dhandha karte rahte hein.
गुरूवार को 21:26 बजे