अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

फेसबुक के चेहरे ने लाखों को लूटा : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर अंक 2 - 8 जुलाई 2014 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

>> सोमवार, 7 जुलाई 2014


मुखोटे, नकाब, जोकर का चेहरा और पुतले एक ही जाति, धर्म इत्‍यादि के अंर्तसंबंधों को जाहिर करते हैं। इनका लुत्फ नए-नए फिल्मी प्रयोग और टीवी चैनल के धारावाहिकों में रोजाना प्रसारित हो रहा है। इन सबको अलग नाम देने के क्‍या कारण रहे होंगे। मुखोटे मुख को ओट कर भी खोटे साबित हो रहे हैं। वैसे इंसान अथवा वस्‍तुएं खोटी होती नहीं हैं पर इंसान उन्‍हें अपने अनैतिक आचरण से खोटा बना देता है। बाजार में खोटे सिक्‍के चलते नहीं हैं, कई बार अप्रत्‍याशित रूप से दौड़ते भी हैं। हालिया पीएम चुनावों में इनका यही रूप पब्लिक ने पहचाना है। खोटे सिक्‍के सिर्फ गहराई की ओर लुढ़क रहे हों और उनके गले में लगाम न कसी जा रही हो, अक्‍सर ऐसा नहीं होता है। जब-जब ऐसा हुआ है तब स्‍पीड ब्रेकर काम आते हैं। अनुभव बतलाताहै कि बहुत अधिक स्‍पीड होने पर ब्रेकर की ऊंचाई बढ़ा दी जाती है अथवा उसमें कम ऊंचाई के दस-बारह स्‍पीड ब्रेकर बना दिए जाते हैं जिससे स्‍पीड को कम कर लिया जाता है। स्‍पीड ब्रेकरों के इस समूह को जिग जैग कहा जाता है जिनसे स्‍पीड स्‍लो हो जाती है। इससे साबित होता है कि खोटी वस्‍तु चल तो सकती है पर इंसान के दिमाग के कारण उसे स्‍पीड नहीं मिल पाती। भारत जुगाड़ प्रधान देश है। वह स्‍पीड कम करने का रास्‍ता निकालता है तो उससे बचने का उपाय भी खोज लेता है। जिग जैग उसी का नतीजा है। पर आश्‍चर्य की बात यह है कि खोटापन दूर करना संभव नहीं हो पाया है।
मुख को ओटने के ऐसे उपायों का आजकल राजनीति में भरपूर वर्चस्‍व है। जिस भी नेता को देखो, वह मुखोटे पहनकर  पब्लिक के सामने रूबरू होता है। ऐसे सत्‍ता के लालचियों का स्‍वभाव उनकी कथनी एवं करनी में अंतर दिखलाता है। सत्‍ता में खोटापन आजकल खूब तेजी से चल और पल रहा है। इसके फलने और फूलने के कारण सब जानते हैं।
मुखोटे लगाने के बाद पहचानना मुश्किल हो जाता है। अब तो मॉल इत्‍यादि में भी हंसते-मुस्‍कराते चेहरों के मुखोटे पहनाकर प्रचार किया जाता है। नतीजतन, ऐसे मुखोटे पहनाकर सबको लुभाकर वस्‍तुओं की बिक्री में बढ़ोतरी की जाती है। वैसे यह सच्‍चाई है कि मुखोटे पहनकर मोहित करने की यह कला सरकस के जोकर का विकसित रूप है। इसका अति विकसित रूप मुखोटे पहनकर जुर्म करना है। इसी परिवार का एक ओर व्‍यावहारिक रूप नकाब है। जबकि नकाब के जरिए नाक की आब यानी आबरू नहीं बचाई जा सकती है। हां, हर मुमकिन कोशिश अवश्‍य की जाती है। इसे धारण करके अपनी पहचान छिपाकर बैंक डकैती और हत्‍या जैसी वारदातें की जाती हैं। यह इस प्रकार चेहरे पर ओढ़ लिया जाता है कि इसे ताकत लगाकर ही पहनने वाले की मर्जी के खिलाफ उतारकर इसे पहचानने का प्रयास किया जा सके। इसमें कई बार सफलता मिलती है और अनेक बार असफलता। वैसे ऐसा भी लगता है कि नकाब पहनने के बाद नाक बाहर रह जाती है और उसकी आब इसलिए बच जाती है क्‍योंकि वह सरलता एवं सहजता से सांस ले पाती है। नाक की आबरू के साथ प्राणों का इंधन धन मिलने से शरीर में भी प्राण बने रहते हैं और नकाब दुष्कर्मियों के चंगुल  में  फंसने से बची रहती है। मुखोटों का खोटापन दूर करके इनका देशहित में कैसे उपयोग किया जा सकता है। अच्‍छे दिन लाए जाने के संबंध में इन पर चर्चा और विमर्श जारी है।
पुतले विरोध स्‍वरूप जलाए जाते हैं। यह आक्रोश महंगाई, पेट्रोल, आलू, प्‍याज, फल इत्‍यादि किसी भी जीव नहीं अपितु निर्जीव का पुतला बनाकर आग  में  झोंककर प्रकट किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बुराई और अपहरण के प्रतीक रावण से पुतला  बनाकर फूंकने का विरोध युग आरंभ हुआ है।

आभासी मुखोटे झूठ और सच का संगम स्‍थल हैं। इनके खोटे होने की जानकारी पुलिस और लाई टेस्‍ट अथवा अनुभव से ली जा सकती हैं। चेहरे के हाव भाव भी संवेदना के स्‍तर पर पहनने वाले की पहचान जाहिर करने में सक्षम हो गए हैं। इनमें आंखें भी सब रहस्‍य खोल देती हैं। इनमें दिल की प्रभावी भूमिका रहती है। एक फिल्‍मी गीत की पंक्तियां इसे बखूबी बतलाती हैं - दिल को देखो, चेहरा न देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा। वैसे लूटने का कार्य आजकल फेसबुक बहुत शिद्दत से कर रहा है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटीइस मौके के लिए ही जगह-जगह हाई वे पर लिखा मिलता है। हैरान मत होइएगा अगर यह चेतावनी जल्‍दी ही फेसबुक पर लिखी मिले। फेसबुक प्रबंधन को सुझाव भेज दिया गया है, इस पर कार्यवाही वही कर सकते हैं। हमें तो इन सब युक्तियों से सतर्क रहने की जरूरत है। वरना सब यही गाते मिलेंगे कि सब कुछ लुटा कर होश में आएतो क्‍या आए और क्‍यों आए ? इससे चंगे तो सोशल मीडिया से दूर रहकर ही अच्‍छे थे। बिना सोशल मीडिया के न इतने बुरे दिन और रातें हुआ करती थीं। तब सब ओर समाज में इंसान और उसके दिमाग में सकारात्‍मकता ही हुआ करती थी। आज बुरे दिन और रातों की विसंगति बीते जमाने में प्रभावी नहीं रही है। अब फिर से उसी माहौल की जरूरत है।

- अविनाश वाचस्‍पति 


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हिंदी फिल्‍मों की बिगड़ती भाषा

>> मंगलवार, 1 जुलाई 2014



फिल्‍मों के संवाद और गानों की भाषा के प्रयोग में भी बाजारवाद हावी हो गया है जिसके कारण सिनेमा में भी राजनीति का वर्चस्‍व बढ़ रहा है। वैसे इसे राजनीति नहीं धन बटोरने का जुनून कहा जाएगा। परदे के पीछे को अगर पिछवाड़ा कहा जाए तो ठीक भी है पर पिछवाड़े का आशय पाठकगण बखूबी समझ गए होंगे और समझें भी क्‍यों न,जब खुलकर आज युवा वर्ग में यह और इससे अधिक बोलचाल में विकृति आ गई हो। गांव के वासी न समझें और कुछ सीधे सच्‍चे शहरी भी न समझ पाएं, पर ऐसे लोग बहुत कम हैं। इसका कारण सिनेमा में इस प्रकार की गाली-गलौच भरी शब्‍दावली का बहुतायत में प्रयोग किया जाना है। आश्‍चर्य तो तब होता है कि ऐसा सिर्फ युवकों द्वारा नहीं, युवतियों द्वारा भी धड़ल्‍ले से बोलचाल में प्रयोग किया जा रहा है। कोई लाज नहीं, कि सामने पुरुष मित्र है। वह जब उसके ओठों से सिगरेट निकालकर कश ले सकती हैं तो इस हद तक भी जा सकती हैं। इसे अब तक बेह्याई माना जाता रहा है पर अब ऐसा नहीं है।
गाली-गलौच आज एक आम बात है जिस पर किसी का ध्‍यान भी नहीं जाता है। इस सोच और प्रयोग के समर्थन में फिल्‍म से जुड़ी टीम ही नहीं अपितु युवक-युवतियों की भीड़ सदैव तैयार मिलेगी। इस पर आज किसी को कोई हैरानी नहीं होती है। जबकि आज से बीसके साल पहले मराठी फिल्‍मकार दादा कोंडके की फिल्‍मों में जब द्विअर्थी संवादों का प्रयोग किया था, तब खूब हल्‍ला मचा था। उनकी फिल्‍मों पर रोक तक लगाई गई थी। धरना, प्रदर्शन,सिनेमा हाल पर तोड़-फोड़ की घटनाएं तो आम बात रहीं। उनकी फिल्‍मों के शीर्षक यथा अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में इत्‍यादि रहे, जिनका भरपूर विरोध किया गया और आज खुलकर गंदी बात की जा रही है लेकिन कहीं से विरोध का कोई स्‍वर सुनाई नहीं देता है।
फिर तो इसे विकास मानना चाहिए। फिल्‍मों में संवाद और गानों के गंदे प्रयोग आज समाज ने स्‍वीकार कर लिए हैं। कैसी विडंबना है, पतन के रास्‍ते को विकास मान कर दौड़ जारी है। फिल्‍में समाज का आईना है या समाज को देखकर उसी के अनुरूप फिल्‍मों का निर्माण किया जा रहा है। बाजारवाद का ऐसा घिनौना रूप इस रूप में हावी हो जाएगा, ऐसा किसी ने कतई सोचा नहीं था। इसे पश्‍चिमी संस्‍कृति का अंधानुकरण इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्‍योंकि तब भी पश्‍चिम में इसी प्रकार का माहौल था। पर तब भारत की पब्‍लिक जागरूक थी। सोई तो अब भी नहीं है पर युवाओं के आगे उनका जोर इसलिए नहीं चल रहा है क्‍योंकि उनकी सैलेरी पैकेज कई कई लाखों तक सालान बढ़ चुके हैं। जिसकी बहुत बड़ी कीमत हमारा समाज चुका रहा है। भाषा का स्‍वरूप बिगड़ा तो है पर टीवी चैनल पर उतना नहीं, हां कॉमेडी के नाम पर दो-चार धारावाहिकों में यह फूहड़पन जरूर दिखाई देता है। एमएफ चैनल के डीजे भी इसकी गिरफ्त में बुरी तरह जकड़े जा चुके हैं।
हाल ही में दिखाई गई फिल्‍म में कॉमेडी के नाम पर सब कुछ परोस दिया गया है। जबकि हमशक्‍ल्‍स में इतना बिगड़ा रूप नहीं है पर वह भी एकदम साफ-सुथरी कॉमेडी फिल्‍म नहीं कही जा सकती है। फिर युवा वर्ग को हमशक्‍ल्‍स में मजा नहीं आता है, वह फिल्‍म को बेकार बतलाते हैं और फिल्‍म को अधूरी छोड़कर चले जाते हैं। जबकि इसके विपरीत फगली में उन्‍हें वह सब मिल रहा है जो टाइमपास के लिए उन्‍हें चाहिए। हमशक्‍ल्‍स परिवार के साथ देखने वाली फिल्‍म बन गई है क्‍योंकि जिस प्रकार के संवाद उसमें हास्‍य पैदा करते हैं, उतने तो टीवी धारावाहिक भी रोज दिखला रहे हैं। उनकी संख्‍या ज्‍यादा नहीं, पर है तो।
अब इतना तो तय है कि भाषा का यही बिगड़ा स्‍वरूप साहित्‍य में भी अपनी जड़ें जमाने में सफल हो रहा है। बाजार का नियम है कि वही चीज बेची जाएगी जो सरलता से महंगी बिक सके। उसकी भरपूर डिमांड हो। साफतौर पर कहा जा सकता है कि किसी ने समाज को सुधारने का ठेका नहीं लिया है, वह जो बिक रहा है, वही बना रहे हैं। ऐसा नहीं करेंगे तो बाजार से बाहर कर दिए जाएंगे, यही बाजार की रीत है, इसी से दुकानदार को प्रीत है। आखिर फिल्‍मकार किसी दुकानदार से कम तो नहीं हैं, वह भी धंधा करने आए हैं। धंधे में नुकसान कोई नहीं चाहता है और मुनाफे के लिए यह सब तो करना ही पड़ता है, इसे तो आप भी मानेंगे।
                                -    अविनाश वाचस्‍पति


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कटहल-कटहलनी की सच्‍ची फिल्‍मी प्रेम कहानी : इसमें मौजूद हिंदी ब्‍लॉगरों को पहचानिए

>> शनिवार, 28 जून 2014


एक कटहल अपनी कटहलनी के साथ अपने-अपने को छोड़कर वीआईपी इलाके में रात के रोमांस की मस्तियां देखने के लिए पेड़ से उतरकर बंगले के बाहर टहलने चले गए। सिने माध्यम से एकदम अपरिचित कटहल लटक कर लंबे नहीं हो पाए थे तो उनके मन में विचार आया कि टहल कर अपनी लंबाई बढ़ा लें। उन्हें बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि फिल्मों में यह तकनीक बहुत आसानी से इस्तेमाल में लाई जाती है। पेड़ पर लटके-लटके राजनीति के कुछ गुर वह अवश्य सीख गए थे। तभी अच्छे  दिन लाने का वायदा करके सरकार बनाने वालों के एक रसूखदार विधायक को वहां रहने का मौका मिल गया। सरकारी आवास में एन्ट्री  मारते हुए नए-नए विधायक ने सब कुछ गिन लिया। लंबे अरसे से पेड़ पर टंगे कटहल और कटहलनी उसकी यादों में बस गए। जबकि वहां नौ और थे। उसने यह भी याद रखा कि वह गिनती में ग्यारह थे जबकि पौ भी कम से कम बारह होती है। सरकारी आवास में एन्ट्री मारते हुए विधायक ने सब कुछ गिन लिया।  लंबे अरसे से टंगे एक युवा कटहल और एक अबोध युवा कटहलनी उसकी नजरों में बस गए। उन कटहलों की हैसियत उस विधायक के आवास पर रहने की कतई न थी। पर लगता है युवा चुलबुली कटहलनी पर विधायक जी की नीयत खराब हो गई। वह ग्यारह में से दो घटकर नौ क्या हुए, विधायक जी की त्यौरियां चढ़ गईं। नौ में दो बढ़कर ग्यारह हो जाते तो तनिक हंगामा न मचता। फिर तो विधायक और उनके आवासीय कर्मचारियों की पार्टी तो बनती है जीका डांस चल रहा होता। जिसमें देशी कम विदेशी अधिक की तर्ज पर जाम पर जाम सबके हलकों से सूखे की स्थितियों से निजात दिला रहे होते। अपनी इन सब मुरादों को पलीता लगते देखकर उन्होंने तत्क्षण अपने मुरादाबाद दौरे को तत्काल प्रभाव से रद्द करने के आदेश जारी कर दिए। जब मुराद पूरी होने की सभी संभावनाओं को सांप सूघकर चला गया तो वह भी सांप के सान्निध्य में रहकर क्यों जोखिम उठाते।  उन्होंने तुरंत रात के दूसरे पहर में ही पुलिस कन्ट्रोल रूम के सौ नंबर पर अपनी सोने की इच्छा त्यागकर फोन कर दिया। आनन-फानन में पुलिस की गाडि़यों की कतार लग गई। यह वही पुलिस वाली गाडि़यां थीं जो शहर में दुष्कर्म होने पर, डकैती की सूचना इत्यादि मिलने पर देरी से पहुंचने के लिए बहुत धूम मचा चुकी थीं।
पुलिस के तंत्र ने मंत्र मारकर विधायक की गुड बुक में आने के लिए आवास में मौजूद सबको एकत्र किया और उनकी रसोईयों में कटहलों की बरामदगी के लिए बिना वारंट ही घुस गई। पर कटहल वहां कच्चा या पका हो तो उनके होने के निशान मिलें। शोरगुल सुनकर पड़ोसी भी आ गए पर उनकी रसोईयों में जांच शुरू करने के लिए पुलिस के पास आवश्यक वारंट नहीं थे। पहले ही बतलाया जा चुका है कि यह इलाका वीआईपी था। यहां पर पुलिस के लिए डंडा चलाना या रौब झाड़ना बहुत महंगा पड़ता। इस महंगाई से पुलिस वाले सदा से बचते आए हैं। रिश्वत की कमाई से भी इस तरह की महंगाई से मुकाबला संभव नहीं है।
उधर यहां के हालात से एकदम बेखबर कटहल और कटहलनी गल और कमरबहियां डाले एकदम दिगम्बर अवस्था में शहर की रंगीन चकाचैंध से अभिभूत हुए जा रहे थे और पछताते हुए बतिया भी रहे थे कि उन्होंने अपनी जिंदगी के कितने ही बरस यूं ही होम कर डाले हैं। आखिर पेड़ उनका होम ही तो है। पर आज वह बेहद खुश थे क्योंकि आधुनिक जीवन शैली के रंग-ढंग देखकर उनकी आंखों के डोरे गुलाबी हो गए थे और कान सुर्ख लाल। इन्हें सुर्खाब के पर भी तो नहीं कहा जा सकता था।
उन्हें मालूम नहीं था कि कटहल के हल कटने के कारण देश भर में किसान रोजाना आत्महत्या करके बने हुए रिकार्ड तोड़ रहे थे। हल कटा या नहीं, इसकी खबर किसी टीवी चैनल पर दिखाई नहीं गई थी जबकि  किसानों की आत्महत्या पर राजनीतिक सौदेबाजी करते  नेता जरूर बयान जारी करते रहते थे। कोई भी नेता कट मारते हुए कम कहकरउ खुद को अज्ञानवान साबित नहीं करना चाहता था। सब अपने-अपने तरीके से बेहतर नतीजों की खोज में जुटे थे। उनकी इस अदा से नेता, नेता कम बाजीगर अधिक लगते थे।
इधर कटहल के सुर्खियों में छाने के कारण अन्य सब्जियों में डाह उत्पन्न  हो गई। वह कटहलों की किस्म्त को देखकर ईष्र्या की आंच में झुलस गई थीं। यूं तो इन दिनों रेल किराए और माल भाड़े में आई महंगाई के कारण अपने रेट बढ़ने से सब्जियां आपस में मिलकर खुशी सेलीब्रेट कर रही थीं। पर कटहल की संचार मीडिया में पहली धमाकेदार  मौजूदगी ने सबको अचंभित कर दिया था। यह सारा श्रेय नई सरकार को गया, जिसके आने से कटहल के अच्छे दिन आए थे।
जबकि यह कटु सत्य है कि किस्मत से अधिक और समय से पहले कभी किसी को बदनामी भी नहीं मिलती है। वहां ईश्वर की मर्जी चलती तो भ्रष्टाचार वहीं से शुरू हो गया होता।  खैर ...
युवा कब किसे सिर पर चढ़ा लें और कब एक झटके में गिरा दें, कोई नहीं जानता। इसलिए सीएम बने हैं पीएम और आम आदमी सीएम। पर सीएम बनने से अधिक, बने रहना अधिक दिक्कत वाला काम है। यहां खालिस ईमानदारी नए सीएम को ले डूबी। युवाओं को भ्रमित करने में सामने वाले कामयाब रहे।
वापसी पर बाहर का यह सीन देखकर प्रेमियों को कुछ समझ नहीं आया पर सारा माजरा जानने के बाद वह सामने वाले पड़ोसी के नारियल के पेड़ पर जाकर उल्टे लटक इस नाटक के मुख्य पात्र (बरतन) बनकर, इन सब्जियों ने खूब ख्याति लूटी और अभी तक लूटकार्य में जुटे हुए हैं। ताजा खबर के अनुसार इन सब्जियों के यूं गायब होने पर सीबीआई जांच बिठा दी गई है।

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बीमारी के वार रूम में हेपिटाइटिस सी : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ तीखी नजर 17 जून 2014 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

>> मंगलवार, 17 जून 2014


मेरी इच्‍छा थी कि  खूब  मुकाबला चला है मेरा, मेरी अपनी बीमारी हेपिटाइटिस सी के साथ, सो वह अब घुटने टेक दे पर उसकी यू्. के. की सरकार का साथ वाला हाथ  मिलाने वाली मिलीभगत सक्रिय है। माना कि दुनिया  गोल  है पर यह गोल फुटबाल वाला नहीं है। हरेक गोल के अलग मायने और अलग तरह की गोलाई है। अगर सारे गोल और शून्‍य एक जैसे होते  तो संभवत: मेरी बीमारी  को  फुटबाल समझ  कर  कुछ लातें लगाने से वह भाग  जाती। जबकि सीजीएचएस की निदेशक महोदया ने स्‍वीकारा है कि इस त‍थाकथित कल तक लाइलाज बीमारी हेपिटाइटिस सी का यू.के. द्वारा इलाज के घेरे में कसकर भी लात नहीं  मार पा रहे हैं हम लोग। लात मारने से अभिप्राय अनुसंधान करके खोजी गई बीमारी की दवाई यू.के. नागरिकों के अतिरिक्‍त अन्‍य किसी को नहीं दी जा रही है  और  इस आशय की लिखित टिप्‍पणी पत्र पर कैमिस्‍ट द्वारा दी गई है। गजब का दुस्‍साहसी है यू.के.,जिससे यह बीमारी मेरे  पैरों से  सूजन  बनकर ब्‍लात घुस कर कब्‍जा कर बैठी है।  इसके साथ ही मेरे  फेफड़ों से खांसी तो मेहरबानी करके चली गई पर बलगम वहीं छोड़ गई है।
इस बीच  एक जांच की खबर सकारात्‍मक आई, जिसमें मेरे दिल  को महामजबूत  बतलाया गया है। सच में इतनी  बुरी बीमारियों के  चंगुल  में फंसे होने  के बावजूद दिल का महामजबूत होना  ही  मुझे जीवन जीने की असीमित शक्ति दे रहा है। नतीजतन, मैं निडर हो बीमारी से संघर्षरत हूं।
डर डर के मरना मैंने जाना नहीं, दर्द को पहचाना पर सुख से अलग माना नहीं। सो बीमारी के सामने घुटने नहीं टेके और हौसला कायम रखे हुए हूं। मैं सिर्फ एक बार मरने वालों में से हूं, रोज रोज  मरना न मुझे आता है और न भाता ही है। बीमारी रोजाना एक गुच्‍छा लेकर  रोज  मेरा स्‍वागत करती मिलती है। अजीब छिपन छिपाई का खेल खेला जा रहा है। कभी वह विजयी रहती है और कभी मैं। अगर इसे पहलवानी की जोर आजमायश माना जाए तो कभी मैं उस पर सवार हो जाता हूं और कभी वो। पर उसके जितने दांव पेंच में मैं पारंगत नहीं हूं। पारंगत नहीं हूं तो क्‍या मैं पराजय मान लूंगा। इस मुगालते में मेरे से उलझने वाली किसी बीमारी को नहीं रहना चाहिए। अब तो स्थितियां इतनी सकारात्‍मक महसूस होने लगी हैं कि  बीमारी मेरे लिए अच्‍छे दिनों की तरह आई है। खैर ...  यह सब अपनी अपनी सोच पर है कि किसी को अच्‍छे दिन भी अच्‍छाई को महसूस नहीं करने देते हैं जबकि किसी किसी को बुरे दिनों में भी अच्‍छाई का अपनापन दिखाई देता है। 
अब जैसे दुनिया गोल है, फुटबाल गोल है और गोल तो गोल है ही, उसी तरह बातें गोल होती हैं। किसी बात का सिरा पकडि़ए और वापिस आरंभिक मुद्दे पर दुनिया भर का मुआयना करके लौट आइए। फुटबाल गोल है इसलिए खूब पीटी जाती है। अब क्‍योंकि उसमें हवा की अकड़ इतनी अधिक होती है कि उसे असर नहीं पड़ता बल्कि कई बार लातों से फुटबाल को पीटने वाला ही घायल हो जाता है। इंसान ने इसे भी खेल बना लिया है। इंसान करेंसी नोटों से भी खेलने का कोई मौका नहीं चूकता है। बस नोट गर्म होते हैं इसलिए उनसे खेलने में वह थोड़ा एहतियात बरतता है पर जब नुकसान लिखा है तो कितनी ही सावधानी बरत लो, नुकसान होकर ही रहेगा। मारना पीटना तो करेंसी नोटों को भी वह लात से ही चाहता है पर वह लात नोटों से होकर उसके अपने पेट और जेब पर न लगेगी इसलिए वह ऐसा जोखिम नहीं लेता है और सदा सतर्क रहता है। पर कई बार जमाने भर की सतर्कता धरी रह जाती है। अब आर. अनुराधा को ही लीजिए, वह पिछले सतरह वर्ष से स्‍तन कैंसर से युद्ध कर रही थी। बहुत हौसले और जीवट की धनी नारी थी पर बीते 14 जून 2014 को रात के अंधेरे में कयामत बनकर बीमारी उस पर टूट पड़ी और उसे ले उड़ी। पर क्‍या वह उसके हौसले, उसकी जीवंतता, उसकी सकारात्‍मक सोच, उसके बहुमूल्‍य क्रांतिकारी विचारों को ले जा पाई। ऐसे ही मेरी बीमारी अपने मोर्चे पर असफल रहेगी, इसका मुझे अटूट विश्‍वास है।


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फिल्‍मकाराें की जीवनी और नेताओं का जीवन : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर के 26 जून अंक 2014 में प्रकाशित

>> सोमवार, 9 जून 2014


जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम और दोपहर को क्या करें,आराम करें लेकिन यह फिलॉसफी फिल्मकारों पर ठीक नहीं बैठती। उनके लिए तो ‘आराम हराम है’ और प्रख्यात हास्य.व्यंग्य कवि गोपाल प्रसादव्यास जी ने अपनी एक फेमस कविता में कहा है कि ‘आराम जिंदगी की कुंजी है, इससे न तपेदिक होती है, आराम सुधा की एक बूंद तन का दुबलापन खोती है।‘ तन अभिनेता-अभिनेत्रियों का ब्यूटीफुल और दुबला होता है पर नेताओं का नहीं।  इससे जाहिर है कि वह आराम ही करते हैं और यह सब वह मन की शक्ति के बल पर करते हैं और चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं कि ‘आराम हराम है।‘ वैसे भी ‘राम हरे या हरे राम ही हैं’ और ‘कन्है्या कारे कारे जामुन की तरह रंगदार और रसदार हैं, उमंग और तरंग से भरे हैं।‘
रंग जीवन का कैसा भी हो, जीवन चलता ही रहता है। कोई रुक भले ही जाए पर जीवन नहीं रुकता और अपनी जीवनी को शिखर पर पहुंचाने के लिए जीवन को रोकने की चाहत रखने वाले भी कम नहीं होते हैं। जीवन नहीं रुकता, न रुके पर हमारे नए-नवेले पी एम ने अपनी जीवनी के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने पर एतराज जतला दिया है, उनके एतराज को रोक ही समझना चाहिए। जबकि उन्हें  जुम्मा-जुम्मा सात दिन हुए हैं पी एम की कुर्सी पर सवार हुए। अभी तो उनकी दौड़ शुरू भी नहीं हुई है। जबकि पी एम की कुर्सी के लिए दौड़ वह पहले से लगा चुके थे और विजयी हो गए। समय का उचित और सटीक प्रबंधन सीखना हो तो कोई नमो से सीखे, यही तिलिस्म है और इसी से  चमत्कार हुआ करते हैं। पर फिल्म  मीडिया में सदा चर्चा में बने रहने को चमत्कार कहते हैं जिसे सब करते हैं नमस्कार, वहां मिलने वाला अधिकतर धन काला ही होता है, इसी काले जादू पर हो जाते हैं मोहित और करते हैं इंतजार।
अब अपनी जीवनी स्कूलों के कोर्स में प्रतिबंधित करके वह बतलाना चाह रहे हैं कि अभी तो उनके कारनामों का मात्र दस प्रतिशत भी जीवनी में शामिल नहीं है। फिर आधी-अधूरी भी नहीं है जो जीवनी, उसे पढ़ाने और बालकों को रटाने से क्या हासिल होने वाला है, आगामी चुनावों में वोट तो बढ़ने से रहे। 60 महीने बीतते-बीतते वह सफलता के अनेक नेक किले फतह कर लेंगे, तब उनकी जीवनी पाठ्यक्रम में शामिल हो तो कुछ मुनाफे की उम्मीद की जा सकती है। कितने ही किस्से-कहानी-कथाएं और कविताएं उनकी वीरता के संबंध में गढ़ ली जाएंगी, ऐसा उनका विश्वास पुख्ता है और सचमुच में तख्त की तरह मजबूत है। वह एक बहादुरी का काम करेंगे और गिनाने वाले उन्हें कम से कम तेरह तो गिनाकर ही मानेंगे। फिर वह अभी से बच्चोंा को जीवनी पढ़वाने का लालच क्यों करें और जीवनी उन्हें  तो पढ़नी नहीं है। उनका लक्ष्यं तो अपने जीवन और जीवनी को चरम पर पहुंचाना है। अच्छे  दिनों को लाना है,बिना देश के लिए अच्छे दिन मंगवाए, जीवनी में जान कहां से आएगी।  फिल्मों मे रोजाना एक लाईन के किस्से भी खूब कयामत बरसाते हैं, इन्हें सुर्खियों में लाते हैं। इन्हें  जीवनी की जरूरत नहीं, इनके हरेक तरह के किस्से मशहूर होते हैं।
जीवन वह वन है जहां पर मनुष्य  का जी रहता है। जी यानी मन की ताकत से सब परिचित हैं। मन की शक्ति अपरंपार है। कहा भी गया है कि ‘मन के हारे हार है और मन के जीते। ‘फिर वह सत्ता में विसंगतियों और त्रु‍टियों के वन को ऐवन स्वरूप क्यों  न दें। ऐवन ही बढ़कर सैवन और जब उनकी जीवनी कोर्स  में शामिल की जाएगी, तब आंकड़ा सैवन्टीन तक पहुंचाएगी। फिर वह वन के चक्कर में क्यों  उलझकर डगमगाएं, सैवन्टीन पर पहुंचकर मजबूत जड़ों से ही जुड़ जाएं।
उनकी जीवनी पर शोध कार्य संपन्न  होंगे। अभी से जीवनी कोर्स में शामिल करना जड़ों में मट्ठा भरने का कार्य होगा। बाद में किसी को मट्ठे की याद भी नहीं आएगी। वैसे भी वह चाय बनाकर पिलाते रहे हैं। खुदा न खास्ता स्वयं चाणक्य भी उनकी जीवनी लेखन के लिए आ जाएं  तो चाय वाले किस्सों की सच्चाई ही बखान करेंगे, मट्ठे की उनको याद नहीं आएगी।  मट्ठी इसलिए याद आएगी क्यों कि चाय के साथ मट्ठी का योग बनता है। मट्ठा स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हुए भी चाय के साथ पिया नहीं जाता। उससे तो कढ़ी बनाई जाती है और चावल साथ में हों तो इतनी लार टपकती है कि उसके सामने तो रसगुल्ले भी फेल हैं क्यों कि रसगुल्ला मीठा जरूर होता है,उसे देखकर लार भी टपकती है। पर रसगुल्ला खाकर न मन भरता है और पेट तो भरता ही नहीं है। कढ़ी खाकर मन और पेट दोनों भर जाते हैं। फिर लार को आधार बनाकर लिखा गया फिल्मी गीत का मुखड़ा कि ‘लारा लप्पा लारा लप्पा लाई करता,’ इससे आगे मुझे स्मरण नहीं, पर फिल्म-प्रेमियों को अवश्य  पूरा गीत व इसका विजुएलाइजेशन याद होगा। जीवनी पर रोक लगाने से जीवन नहीं रुका करता, मैं तो यही कहता हूं और कहता रहूंगा। इसी मार्ग से फिल्मों  की सद्गति होती है। इस सदगति में धन का रोल अहम होता है, बाकी सब वहम और अब कौन  करेगा  किस  पर  रहम।

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जनता दरबार का लुत्‍फ : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स 3 जून 2014 के अंक में संपादकीय पेज पर स्‍तंभ 'उलटबांसी' में प्रकाशित

>> मंगलवार, 3 जून 2014


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धूम्रपान निषेध दिवस पर धूम्रपान कभी न छोड़ें - अविनाश वाचस्‍पति

>> सोमवार, 2 जून 2014

आप कोई स्‍वार्थी हैं जो अपने हित की बात करेंगे। आप सदा तंबाकू उगाने, बेचने वाले सौदागरों का भला चाहते हैं। इंसान वही जो सदा इंसान के काम आए। यह क्‍या कि अपनी जान के लालच में सामने वाले के पेट पर लात मारता चले।

अगर तंबाकू नहीं उपजेगा, नहीं बेचा जाएगा तो इससे जुड़े कितने ही मासूम बच्‍चों, स्त्रियों, पुरुषों,  दुकानदारों को नुकसान होगा और आप इंसान हैं, आपका दिल, भावनाएं इन सबके लिए चिंतित हैं। वह ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे इनकी रोजी-रोटी में खलल पड़े।

अगर यह इतना ही जोखिमयुक्‍त होता तो सरकार कानूनन इस पर प्रतिबंध नहीं लगाती। नहीं लगाया मतलब इससे कोई खतरा नहीं हैं, इसलिए आप देख रहे हैं देश में प्रत्‍येक शहर में जितनी इनकी दुकानें हैं, जितना इनका व्‍यापार होता है, अन्‍य किसी वस्‍तु का नहीं होता।

प‍ढ़कर आनंद लीजिए दो छोटी-छोटी कविताओं का :-

1.

 विश्‍व तंबाकू दिवस पर
मित्र ने कहा यानी समझाया
पीना छोड़ दो
पर हमारी समझ में कतई नहीं आया
आखिरकार  हम गधे हैं
मूर्ख हैं, उल्‍लू हैं
हुड़कचुल्‍लू  हैं
जवाब दिया तुरंत
पानी पीना छोड़ दूं
मर जाऊं
खुदकुशी कर लूं
और तुम्‍हारे ऊपर
चढ़ने  के लिए
जीना छोड़ दूं।


2.

पीना सिर्फ
पानी का ही होता है
पानी पीकर ही
इंसान जीता है
धुंआ भी भला
कोई पीता है
आसमान में
बादलों के बीच
जीता है
धुंए का तो
खींचा जाता है कश
और बादल
तिलिस्‍म है
पानी से लबालब
होते हैं
पर खाली दिखते हैं
उन्‍हें न तो खाया
न पिया ही जाता है
नहाना  भी  संभव  नहीं
बस कर
मुझे मत बना पप्‍पू
मुझे मेरे हाल पर
छोड़ दे
जो कर रहा हूं
करने दे
बनकर नौकर1

- अविनाश वाचस्‍पति

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