अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

हेपिटाइटिस सी से कैसे सावधान रहें

>> सोमवार, 25 मई 2015

लिवर की सत्यकथा : हेपिटाइटिस सी जैसे रोग से पीडि़त अविनाश वाचस्‍पति की स्‍वानुभूति

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  • -    अविनाश वाचस्‍पति
    एक हूं पर मैं कई रूपों में आता जाता हूं, मैं हूं रूप नेक, पर अनेक। जो आत्‍माएं इस तथ्‍य से परिचित हैं कि टीम वर्क की क्‍या महत्‍ता है और परमात्‍मा और आत्‍मा के संचालन में इसकी क्‍या जरूरत है, वो यह भी जानते हैं कि शरीर में लिवर, फिल्‍म निर्माण में टीम वर्क क्‍यों आवश्‍यक है। इसकी जरूरत से सिर्फ वहीं परिचित होगा जो न टीम वर्क, फिल्‍म वर्क और न परमात्‍मा के सुचारू संचालन से अच्‍छी तरह परिचित होगा।
    जिस प्रकार टीम वर्क की हरेक नेक निर्माण में दरकार रहती है, उसी प्रकार लिवर की प्रत्‍येक प्रकार के अच्‍छे निर्माण में जरूरत रहती है। इससे किसी को इंकार न तो होगा और न हो ही सकता है। लिवर की जरूरत जीव और जीवन से जुड़ी सभी वस्‍तुओं से होती है। खिलौनों के लिए लिवर की जरूरत है, इसका अर्थ है कि सभी प्रकार की मशीनरी के लिए लिवर जरूरी है। बिना लिवर के किसी का बनना और चलना संभव नहीं है। जिस प्रकार सभी प्रकार के खिलौनों में लिवर जरूरी है, उसी प्रकार सभी जीवनी वस्‍तुओं में लिवर बहुत जरूरी है। जिस जिस में प्राण है, उसी को सब करते प्रणाम हैं, यही प्रमाण सबको मिले हैं। एक चींटी से लेकर इंसान और जानवर तक की बिना लिवर के संकल्पना नहीं की जा सकती है। प्राणवान वस्‍तुओं में मच्‍छर, पतंगा, कीट, कीड़े, चूहे, बंदर, छछूंदर, हाथी, शेर, चीता, लोमड़ी, बिल्‍ली सबमें लिवर सर्किय रहता है, इनमें किसी प्रकार का लिंग भेद नहीं होता है, चाहे वह औरत हो, हिजड़ा, पुरुष मतलब नर अथवा मादा।  इनमें लिंग भेद की कोई महत्‍ता नहीं है।
    लिवर का जरूरी रोल होते हुए भी बिना टीम वर्क के यह कार्य नहीं कर सकता है। जिस प्रकार लिवर के एक्टिव होने के लिए हर्निया, सांस, गॉल ब्‍लॉडर जरूरी हैं, चाहे इनका किसी भी भाषा में कोई भी नाम हो, उसे अंग्रेजी में लिवर, हिंदी में जिगर, मलयालम में कॉरेल या किसी भी भाषा में कोई भी नाम दो, सबका काम एक ही होता है, बिना इनके कोई किसी का होना चलना संभव नहीं है। फिल्‍म में टीम वर्क में एक्टिव डायरेक्‍टर, एक्‍टर, पटकथालेखक, कहानी लेखक, संवाद लेखन, गीत लेखक, कैमरा संचालक और इसमें निर्जीव में जीवन फूंकने वाले कैमरा तक की मिली जुली सक्रिय भूमिका रहती है। मतलब लिवर का और होना, टीम वर्क का रहना – सबका जरूरी है। इसी प्रकार लिवर जरूरी है और टीम वर्क भी जरूरी है। अगर यह कहा जाए कि दोनों के समन्‍वयन में सृष्टि का संचालन निहित है तो यह एकदम सत्‍य है, सच्‍चाई है और इस सच्‍चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

    जिस प्रकार लिवर जरूरी है उसी प्रकार एक नहीं अनेक नेक कार्यों में टीम वर्क जरूरी है। बिना समूह के बहुत से कार्य नहीं किए जा सकते हैं। कोई भी कार्य बिना टीम के संभव नहीं है तो यह एकदम समीचीन है। लेखन कार्य में सिर्फ मानस ही नहीं, उसकी सकारात्‍मक और नकारात्‍मक सोच भी एक्टिव रहती है, उसी प्रकार कलम, कंप्‍यूटर, कॉपी, पैंसिल, ई स्‍लेट भी जरूरी है और बहुत सारी चीजों को तो तो सोच भी नहीं पाते हैं। आखिर सपने क्‍या यूं ही आते हैं। वह भी लेखन में सक्रिय रहते हैं। इस सक्रियता का ताना बाना बुनना आसान नहीं है। इनका सोचना और कागज पर उतारना आसान नहीं है और न ही कंप्‍यूटर पर उकेरना सरल है।
    इसी सहज सच्‍चाई की इस सरलता का इसकी पूर्णता में कोई नहीं पहचान पाया है और न सभी पहचान ही पाएगा। जीवन यूं ही चलता जाएगा, प्रगति की गति के पथ पर सभी प्रकार की दुर्गतियों को पार करते हुए उन्‍नति के पथरीली, उबड़ खावड़ रास्‍तों पर भी आगे ही बढ़ता रहेगा। आप इसे तकनीक भी कह सकते हैं और कहने वाले इसे जादू भी कहते हैं। फिर जादूगर परमात्‍मा भी हुआ और लेखक भी। किसी भी प्रकार के रचयिता या रचनाकार को न तो इग्‍नोर करना पॉसीबल है क्‍यों इसे अपनाना ही बल है, यही सब को सबल बनाता है। सबल बनना मतलब बलवान होना ही है और लिवर और टीम वर्क से बलवान इस सृष्टि पर भला और कौन होगा ?
    #‪#‎HELPBANKACCOUNT‬
    ICICI SAVING BANK ACCOUNT NO, 629401135858/110229017 BANK DETAILS ICICI BANK, SHAKUNTALA APARTMENTS, NEHRU PLACE, NEW DELHI IN THE NAME OF SARVAISH VACHASPATI WIFE OF AVINASH VACHASPATI.
    OR SBI SAVING BANK ACCOUNT NO, 20190460651 NEHRU PLACE BRANCH IN THE NAME OF AVINASH VACHASPATI, 
    MORE THAN FRIENDS NOT EVEN RS.500/- ONE TIME HELP. AVINASH VACHASPATI SABHI KA BAHUT ABHARI HAI.HEPITITIS C KI JANG JEET HI LEGA. MOB. 08570321868
    (लेखक की शीघ्र प्रकाश्‍य पुस्‍तक ‘चैंटिंग विद लिवर’ का एक महत्‍वूपर्ण अंश)

    संपर्क : साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन01141707686/08750321868/09868166586 ई मेलnukkadh@gmail.com वेब साइटwwwण्‍nukkladh.com

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    >> शुक्रवार, 20 मार्च 2015

    ICICI SAVING BANK ACCOUNT NO, 629401135858/110229017 BANK DETAILS ICICI BANK, SHAKUNTALA APARTMENTS, NEHRU PLACE, NEW DELHI IN THE NAME OF SARVAISH VACHASPATI WIFE OF AVINASH VACHASPATI.
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    परिकल्पना व्यंग्य भूषण सम

    >> शनिवार, 13 दिसंबर 2014


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    तुमने किसी को मीठा खाकर मरते हुए देखा है - मधुमेह दिवस पर विशेष कविता अविनाश वाचस्‍पति

    >> गुरुवार, 13 नवंबर 2014

    तुमने किसी को
    मीठा खाकर
    मरते हुए
    देखा है

    देखो वह
    डरकर
    मीठे से
    कर रहा है
    परहेज

    खा रहा है मीठा
    रात को फ्रिज
    खोलकर
    फिर भी है
    जिंदा
    इै इसी धरती
    का बाशिन्‍दा

    नहीं खा रहा है मीठा
    इसलिए मीठी चीजों की
    देख लो जान जा रही है
    हलवाई डर रहा है
    सोच रहा है खोलूं
    नमकीन की दुकान

    पर नमकीन पकवान
    कौन खाएगा मेहरबान
    नमकीन खाकर भी
    तेल से उसकी जान
    जा रही है

    बचा लो उसे
    जिस पर हो रही है
    मधु की बरसात
    गंदे तेलों से मुलाकात

    जिसने मरना है
    उसे बचा नहीं सकता
    न भगवान
    न चमराज

    तुमने किसी को
    मीठा खाकर
    मरते हुए देखा है

    देख लो
    खा रहा हूं रोज
    मीठा
    चाहे दिन हो या रात
    फिर भी हूं जिंदा
    इस धरती का बाशिन्‍दा

    मीठा इस बात पर
    हो रहा है शर्मिन्‍दा।

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    पहल (कविता) अविनाश वाचस्‍पति

    >> गुरुवार, 6 नवंबर 2014

    कविता
    पहल
    - अविनाश वाचस्‍पति
    पहल खुद पहलकारक हो
    तो अच्‍छा लगता है
    पर पहेली का न बने
    न पैदा हो पहले से
    पहल ही रहता है
    पहल का हल
    सदा विचारों की फसल
    उपजाता है
    शून्‍य से खुद को
    भीतर तक जलाया है
    झुलसाया है
    सच बतलाऊं
    भीतर तक तपाया है
    पहल पर्याय का हो
    कविता, कहानी, उपन्‍यास
    नाटिका, नौंटंकी या
    किसी भी विघ्‍नबाधा की पहल
    पहल ही करता है
    या नहीं
    पर पहल हो जाती है

    पहल की गाड़ी
    सड़क निर्माण से पहले
    पगडंडी पर दौड़कर
    आगे निकल जाती है
    किसी को सुनाई दे या न दे
    पर पहल का कोलाहल
    कल कल करता मन
    को भीतर तक मोहता है
    मन से धान को मल मल
    पर मन को कल कल रास आती है
    पर ध्‍वनि यह न रास से
    न रस्‍सी से बांधी जाती है।
    -    अविनाश वाचस्‍पति
    -साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन 01141707686/08750321868 ई मेल nukkadh@gmail.com



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    इंतजार कायम रहे (कविता) अविनाश वाचस्‍पति

    >> शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

    नाउम्‍मीदी में खुशियों की ईद है
    जो कल गई है वापिस वो दीवाली है
    मन में मिलने की हरियाली है
    सबसे प्‍यारे हैं इंतजार के क्षण
    जल्‍दी भंग नहीं होते, भंगर नहीं होते
    इंतजार में होता है सुकून
    जब होता है सुकून
    तब और कुछ नहीं होता
    न होती है चिंता
    नहीं होता है तनाव
    मिलने की आब मन में
    बसी रहती है
    जब इंतजार होता है
    तब और कुछ नहीं होता जनाब

    विचारों का यह एक ऐसा सोता है
    जो सदा लगता है सकारात्‍मकता में
    फबता है सकारात्‍मकता में
    कभी नकारात्‍मक नहीं होता है
    सोना यह सोना है
    स्‍वर्ण नहीं है
    स्‍वर्ण तो वह इंतजार है
    जितना चाहे मिल जाए
    पर भूख इसकी मिटती नहीं है
    प्‍यार इसकी घटती नहीं है
    बनती है ऐसी घटना
    कि चाहकर भी घटती नहीं है

    इंतजार खुशियों की झोली है
    जो आने वाली है वह होली है
    अभी कल जो गई है वह दीवाली है

    इंतजार से ही
    कभी पैदा होती है नाउम्‍मीदी की सब्जियां
    हरी हरी फलियां, लाल लाल टमाटर
    महंगा प्‍याज, बैंगनी बैंगन
    पर इन सबसे हरियाली है
    रंग कोई भी हो
    हरियाली भाती है
    रंगों की धरोहर है
    पर्यावरण का जौहर है
    जौहरी कोई नहीं
    पर इंतजार है

    इंतजार में ही सारा संसार है
    संसार का व्‍यापार है
    वैज्ञानिकों का तकनीकी संसार है
    सारा सार इसी में है
    इंतजार है

    पर प्‍यार इसी में है।

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    संतुलन अथवा असंतुलन - अविनाश वाचस्‍पति (कविता)

    >> शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

    चलने वाले दो पैर पर
    अचरज नहीं होता
    न मुझे, न तुझे और
    न किसी अन्‍य को।
    धरती पर मौजूद
    इंसान से गिनें तो
    उपकरणों पर रुकें
    पक्षी भी मिलें
    संतुलन का पर्याय
    साइकिल से शुरू करें
    टू व्‍हीलर तक सब
    संतुलन धर्म निबाह रहे हैं।
    जानवर चलते-दौड़ते
    चार पैरों पर तेज गति से
    गति से होकर मुक्‍त
    दुर्गति को होते प्राप्‍त
    कुत्‍ते से गिनती करें
    सूअर से आगे बढ़ें
    पहुंचें चींटी तक।
    वाहनों में भरकर
    वाहन तक पहुंचें
    कार से लेकर जीप तक
    सब असंतुलित।
    दो पैर सदा संतुलित
    इंसान के
    चार ही तो हैं असंतुलित
    मोटरकार, जानवर के
    चार पैर चलते तेज
    होते असंतुलित।
    दो पैर सधे हुए
    चार असंतुलित
    जैसे जानवर, कार के
    संतुलन और असंतुलन
    इंसान और जानवर का अंतर
    भेद देता है, खोल देता है
    रहस्‍य सब
    तेज गति दुर्गति का पर्याय
    रोज भोग रहे हम।

    मोटरगाड़ी होती असंतुलित
    साइकिल सदा संतुलन में
    गति कम कंट्रोल अधिक
    गति तेज दुर्गति की जन्‍मदाता।
    एक कवि ने कहा है
    बाहर भीतर एक समाना
    तब कहा होगा
    रहा होगा समीचीन
    पर अब नहीं
    वह जमाना।
    न बाहर
    न भीतर
    एक अथवा अनेक
    कोई भी नेक
    नरक में बसते हैं
    स्‍वर्ग को तरसते हैं
    इस चाहत में
    चाहते हैं सब
    मरना, अमर नहीं कोई
    किसी आयु का
    किसी भी वायु में
    उड़ जाते हैं
    ख्‍यालों की तरह
    कल्‍पनाओं को लगाकर पंख।
    आंक सके तो आंक
    लेकर मन की आंच
    जो कहा है मैंने
    सच कहा है
    सच के सिवाय
    कुछ नहीं है
    और न कहा है।
    -    अविनाश वाचस्‍पति

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