अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

पड़ोसी के आसमान में शरीफ्र तोते ... : दैनिक मिलाप स्‍तंभ 'बैठे ठाले' 15 मई 2013 अंक में प्रकाशित

>> बुधवार, 15 मई 2013


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सारे जहां से प्‍यारा मामा हमारा : दैनिक कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस 8 मई 2013 अंक में प्रकाशित

>> बुधवार, 8 मई 2013





मामा भांजे के संबंधों को नए आयाम मिले हैं। भाई भतीजावाद को धता बताते हुए नए मुहावरे गढ़े गए हैं। भांजा कहते ही महाभारत में अनुभूत होने वाला सुकून, आज कई गुना अधिक प्रभावी तौर पर महसूसा जा रहा है। सारे चैनल, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया की हरेक डाल पर मामा भांजे की चिडि़या ही चहचहा रही है। सारे जहां से अच्‍छा मामा हमारा, हम भांजे हैं इसके, यह मां का भाई हमाराअपनेपन के रिश्‍तों की मधुर गुनगुनाहट वर्तमान की सटीक आहट और चाहत बनकर उभरी है। भांजा मेरा मुझको प्राणों से प्‍यारा है।  
कथा रेल की हो, रिश्‍वत की, कोयले की या कंचन की हो, कंचनी देह की भी हो सकती है  सब स्‍याह ही हैं। देह से ही रिश्‍तों की परतें छलनी की जाती हैं। दोनों हाथों से सब समेट लिया जाता है। ऐसी कथाओं के मूल में घपलों का संवादी स्‍वर सक्रिय रहता है जिन्‍हें परवान चढ़ाने के लिए रिश्‍ते ही नए नियामक बन रहे हैं। सत्‍ता का छौंक इसे जायकेदार बनाता है। मुंदी आंखें भी खुली रहती हैं, उनींदेपन का भी अपना आनंद है। ऐसा लगता है कि अतीत में किए गए ‘मामाकर्म’ से प्रायश्चित स्‍वरूप ‘भांजाकर्म’ की खुली छूट का मौसम गुलजार है। वह मौसम ही क्‍या, जिससे तिजोरी की चमक और धमक में बढ़ोतरी न हो। समृद्ध से समृद्धतम की ओर का यह सफर,तम के जुड़ने से उन अंधेरों की ओर ढकेलता है, जिससे पावन रिश्‍ते भी नापाक होने के लिए अभिशप्‍त हैं।
मामा के मायावी तिलिस्‍म से आज भांजा चकित नहीं है। वह मामा को हैरान कर रहा है या नहीं, इसे हम नहीं जानते। मामा जानते होंगे, देश के मुखिया जानते होंगे – पर किसी पर इस रहस्‍य का पर्दाफाश नहीं करना चाहते। जबकि उनकी कुटिल चालें मुखर हो सब जाहिर करती हैं। यह इस्‍तीफा नहीं देते और लतीफा बन रहे हैं। सोशल मीडिया ने इनके लिए जितने लतीफे गढ़े हैं, वह इतने नायाब और बेमिसाल हैं कि मन करता है कि ऐसी सर्जना अनवरत् जारी रहनी चाहिए।
न जाने हम सभी चीजों के नकारात्‍मक पक्ष को ही देखने के मोड में क्‍यों डिफाल्‍ट हो गए हैं। यह नहीं देख रहे हैं कि इसके जरिए कितनी प्रतिभाएं, उनकी नायाब सोच विकसित हो, समाज के सामने परिलक्षित हो रही हैं। हमें परंपरा से जो आधा खाली गिलास मिला है, हम उसे पूरा खाली करने में प्राणपण से जुटे हैं। यह मानना चाहिए कि उसे खाली करके उसमें प्राणदायी वायु संचित की जा रही है। यह क्‍या कम सुकून की बात है। पूरे गिलास में हवा का भरना उसे हल्‍का करने के साथ उपयोगी भी बना रहा है। पानी का क्‍या है, चाहिए होगा तो दो आंसू अधिक बहा लेंगे लेकिन जो हवा शरीर से बाहर निकाल ......... फूंक मार कर इकट्ठी करेंगे, वह शुद्ध नहीं होगी। आजकल शुद्धता मिलती ही कहां है, संबंधों की शुद्धता के जरिए, विशुद्ध घपलों का घालमेल, रिश्‍तों को गर्माहट दे रहा है। अब गर्मी है तो क्‍या हुआ, नोटों की गर्मी की प्‍यास तो सदा बनी रहती है, उसे कायम रखने के लिए किए जा रहे उद्यमों की प्रशंसा करनी तो बनती है। आखिर लोहा ही लोहे को काटता है, सोने से तो कुछ नहीं कटता, खो जाता है।

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विंसगति की संगति का समन्‍वयन हैं फिल्‍में

>> बृहस्पतिवार, 2 मई 2013



मैं क्या करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया। फिल्म में कलाकार का किरदार एक बुड्ढे का भी और कॉमेडियन का भी। कहां बुढ़ापे के बोर नीरस जीवन के साथ कॉमेडी का भरपूर जलवा। यह फिल्मों  में ही संभव है। फिल्म  में वह सब संभव है जो साहित्य में असंभव है। साहित्य  तो छोड़िए किसी भी रचनात्मक विधा में भी नहीं। फिल्म में सब कुछ घटने के नाम बढ़ता जाता है, सब संभव है। संजीव कुमार नौ जन्म लेते तब भी नौ किरदार बखूबी नहीं निभा पाते लेकिन फिल्म  नया दिन नई रातमें उनकी अदाकारी बेमिसाल साबित हुई। यहां आकाश भी हद नहीं है, इसके बाद और पहले भी उन्होंने कई फिल्मों में अनेक नेक और विलेनत्व पूर्ण किरदार भी निबाहे। वह ठाकुर बनते हैं (शोले) और किसी (खामोशी) में सुनने में असमर्थ पर समझने में माहिर, भांति भांति की दिलकश भ्रांतियां।

एक फिल्म में चोर बन जाइये, सब कुछ चुरा ले जाइये, अपने चोरत्व का दीवाना दर्शकों को बनाइये। उसके बाद अगली फिल्म  में पुलिस बनकर दर्शकों की गालियों को महसूस कीजिए। फिर किसी फिल्म में ठग, उससे अगली में डकैत, उससे अगली में मजनूं, फिर एक में भिखारी और दूसरे में परोपकारी। विसंगतियां इतना जोर मारती हैं कि एक ही फिल्म में विसंगति की तलवार भांजो दुधारी। डबल रोल का चमत्कार।  विसंगति और गति दोनों तेज गति में। धन भी बरसे, मन भी सरसे। और अब तो हद भी पार हो चुकी है, वास्तवविकता के नाम पर गालियां और भद्दे संवाद बोल रहे हैं, युवा पीढ़ी पसंद कर रही है। फिल्म है इसलिए बेशर्म होकर कपड़े खोलो, लाज शर्म को उतार दो, यह भला क्या बात हुई ? एक से बढ़कर एक सीन को मीन बना दो, सीन में सीना दिखला दो। हसीना दिखला दो। हसीना हो और हंसी न हो तो हंसी के इफेक्ट डलवा लो। पसीने के नाम पर सब खारा और नमकीन बहा दो।

इससे अगली फिल्म के सीन में कयामत ढा दो, उम्र बढ़ा दो, बाल सफेद चेहरा झुर्रीदार, कंपकंपाती, लड़खड़ाती आवाज, खड़खड़ करता किरदार। दर्शक को सब भाता है, वह मां के नहीं, हसीना के किरदार में किरदार को चाहता है और असल जिंदगी में उसका फैनयानी प्रशंसक बन जाता है। मन को भाती हैं विसंगतियां। वो क्या  करे जो उसको बुड्ढा मिल गया। किसी जवान को बुढ़िया भी मिलेगी, तब आपकी सारी बत्तीसी खिलेगी। विसंगति से संगति का एक-एक जोड़, चिपक कर बन गया है फेविकोल।  जो मल्टीप्लैक्स सिनेमाघर से जोड़ता है। दर्शक शुक्रवार के पहले शो की तरफ पैसे लेकर अंधाधुंध दौड़ लगाता है और टिकट हथियाने में कामयाब हो जाता है। सबसे पहले फिल्म देखता है, बिना यह जाने कि उसमें क्या है, क्यों होगा, पहले दिन, पहला शो फिल्म  का देखना किसी नशे से कम नहीं है। सबसे पहले वेबकूफ बनने में भी विजय हासिल करके रहेंगे,  कोई और कामयाब नहीं होना चाहिए। और भी होते हैं तो होते रहें, कोई दुख नहीं, पर खुद को यह मौका किसी कीमत पर नहीं गंवाना है। वेबकूफ बनाने वाला उसका अपना है, यह सपना नहीं, आज का सच है।

आइटम सांग झूठ है और झूठ होता है लुभावना।  परदे पर प्रदर्शन झूठ है, क्या  फर्क पड़ता है। मुझे अपने सपनों में खोने दो, शादी हो जाने दो, शादी हो जाएगी’ - मतलब गीतों में भी वेबकूफाई की मलाई सब चाटने खाने को तैयार हैं। झूठ की गाढ़ी मलाई में आनंद है, वह मिलता बनकर परमानंद है। अब शादी न हो, जरूरत भी नहीं है। कानून में मोच नहीं, लोच है। यह लोच फिल्मों में और भी लचीली रसदार लीची के माफिक है। लिव इन रिलेशनशिपसंबंधों का वह जहाज है जो हवा में रहता है और पानी-पानी होते हुए भी पानी से बचा रहता है। सब जानते हैं कि गति सड़क पर गिराती है। शरीर और मन को जख्मी कर देती है, लहू नजर नहीं आता, पर यही जख्म सबको सुकून भरी गुदगुदी से तर कर देते हैं।

विसंगति की संगति ही हॉरर फिल्म को कॉमेडी बना देती है। विसंगति पॉवरफुल है। संगति धराशायी है, किसी को अच्छी नहीं लगती। दुखांत हो, सुखांत हो - सबमें विसंगति का बोलबाला है, संगति का कर दिया गया मुंह काला है। काला यह कोयला नहीं है, कोयल भी नहीं है पर ऐसी सभी फिल्मों की कुहू कुहू भाती है। बनाओ कुछ, अर्थ निकले कुछ और सचमुच में अर्थ समेट लो, अर्थ जो पैसा है, अर्थ जो जमीन है, अर्थ न हो तो बिजली का करन्ट बहुत तेज लगता है, कई बार प्राण हर लेता है और शरीर को नीले रंग में रंग देता है। निर्माता, निर्देशक, लेखक, तकनीशियन, वितरक सब चकित हैं - दर्शक का रूझान चुनावों के रूझान से भी अधिक रहस्यमयी है। इसमें रहस्य भी मय है। नशा नशा ही होता है, मौका आने पर वह हिरण हो सकता है पर नशा शेर होता है, सवा सेर होता है, डेढ़ सेर होता है - अब जल्दी ही दो सेर होगा। नशा ही फिल्म की शान में दोगुनी चौगुनी चौंसठगुनी बढ़ोतरी करता है और फिल्म  की पहचान बनता है।

गीत की गति में विसंगतियों की भरमार मिलेगी। दुधारी तलवार ही नहीं, कुंद होती धार भी मिलेगी। जहां धार में राधा का प्रेम भी है, वहां धार में मीरा की भक्ति भी है, बजरंग बली की शक्ति भी है, देवी की महिमा भी है और शरीर की मस्ती भी है, सभी राग और रंग भरपूर हैं - पर इनमें कन्हैया को पहचानना होगा। कन्हैया कौन है, वह दर्शक तो नहीं है। कुछ-कुछ अहसास होता है कि फिल्म  बनाने अथवा बेचने वाला है या फिल्म के किसी किरदार में होगा। और लो मिल गया ओह माई गॉडयानी ओएमजी का बांका, छैल छबीला - अक्षय कुमार मोटरसाईकिल सवार है। बांसुरी में भी खूब फब रहा है। इससे बड़ी विसंगति और क्या होगी कि गैया चराने वाला तेजगति से मोटरसाईकिल चला कर लुभा रहा है, बांसुरी की धुन से सबको दीवाना भी बना रहा है। आज दीवाना बनाना ही कन्हैया होना है, इसमें संगति ही संगति है, आपकी नजर में हो सकती है पर वह विसंगति है भी और नहीं भी। यह दिनन का नहीं, समझ का हेर-फेर है।

वह यह नहीं गाता है कि ले देती मां मुझे जो बांसुरी तू दो पैसे वाली, किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली और मैं भी कदंब के नीचे बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे। आप पहचान रहे हो, क्या, इस एंगल से सोचा नहीं। आपको सोचने की जरूरत भी नहीं है। सोचने बरगलाने की सारी ठेकेदारी फिल्म वालों की है, उनका अधिकार क्षेत्र है। आपकी घुसपैठ का उसमें कोई स्कोप नहीं है, आपको तो बस हां में हां करते जाना है। फिल्म बनाने वाले की सोच में ताल बैठानी है, ताल में डूबना है, आप डूबेंगे तभी वे ताल में तरेंगे, तरेंगे और तैरेंगे भी और तरंगे महसूस करेंगे आप। आपको निबद्ध होना है क्योंकि आपको सब पका-पकाया मिलेगा। आपके पास करने के लिए और बहुत कुछ है। सोशल मीडिया है, परिवार है, मित्र हैं, आभासी हैं, वास्तविक हैं, चपल चैनल हैं जो सच्चाई से दूर हैं, अखबार हैं जो सच्चाई न बतलाने को मजबूर हैं। संचार के इतने सारे माध्यम हैं। इनके यम का शिकार होकर मय का पान करना है। मायने में रस है, मायने नहीं हैं तब भी क्या हुआ घ् यम डराता है, मय डर भगाती है। एक पास लाता है दूसरा दूर ढकेलता है। एक बटोरता है, दूसरा उंडेलता है। पर इस सारी प्रक्रिया के दौरान आंखों ने मुंदे ही रहना है, उन्हें  नहीं खुलना। यह घूंघट के पट नहीं हैं कि खुलेंगे तो पिया मिलेंगे। आंखें खोल लीं तो सब पिये मिलेंगे, क्या पीते हैं, मय पीते हैं।

विसंगतियों का सफर संगति के साथ यूं ही गति पकड़ कर तेज, तेज और तेज दौड़ता ही रहेगा। समय की गति भी पीछे रह जाएगी, प्रकाश की गति भी इससे हार जाएगी। इसमें फिल्मी मति का तीखा छौंका लगाया गया है। आपको मोहित और सम्मोहित करने के लिए इसकी सुगंध ही काफी है। यही खींचातानी जेब से मुद्रा खींचती है। आखिर आप इनके लिए ही हैं और यह आपके लिए। हम सब बने हैं एक दूजे तीजे के लिए। सिनेमा इसी का बाजार है, इसी की कला है, विधा है, कविता है, गीत है, मादक संगीत है। यही माफी पाने की रीत है, इसे रीतने मत दो, जीतने दो। उसकी जीत में भी आपकी जीत है। आप जीते जग जीता। आप हारे तब भी जग जीता। इस समय सबके जीतने का है सुभीता। इसलिए जीतो जीतो विसंगतियों को संगति की डाल पर बैठाकर खूब जोर से खींचोगे तब भी नुकसान नहीं होगा क्यों कि आप मन से सींच रहे हैं

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पुलिस डंडे से पापड़ बेलती है : जनवाणी स्‍तंभ तीखी नजर 30 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित

>> मंगलवार, 30 अप्रैल 2013


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खलनायक नहीं, नायक हूं मैं : बौलीवुड सिने रिपोर्टर के 17 से 23 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित

>> शनिवार, 20 अप्रैल 2013


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चैन से सोना है तो सोना खरीद लो : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ तीखी नजर 16 अप्रैल 2013 में प्रकाशित

>> मंगलवार, 16 अप्रैल 2013


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कुर्ता जो फट गया तो ... : दैनिक नई दुनिया स्‍तंभ अधबीच 11 अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित

>> बृहस्पतिवार, 11 अप्रैल 2013


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