अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

जादू की की, यानी बोले तो मंकी : 15 अप्रैल 2014 को DNA में प्रकाशित

>> मंगलवार, 15 अप्रैल 2014


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मंकी बोले तो मन की बात - कविता (अविनाश वाचस्‍पति)

>> शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

 #‪#Monkey
मंकी बोले तो बंदर
केला लेकर हाथ में
घुसता संसद के भीतर
नहीं है तीतर
बिल्‍ली भी नहीं पास में
केला खुद खाते हैं
छिलके पर पब्लिक को
फिसलाते हैं
केला चित्‍तीदार समझकर
काले धन को सफेद  केला
बनाना  खा जाते हैं।

संसद में बैठे
यूं  तो  सब मंकी हैं
बंदर नहीं कहूंगा मैं
मंकी को दूंगा नया अर्थ
चुनाव के उपरांत
संसद में उछलते कूदते
नजर आएंगे।
चाहता हूं मैं
इच्‍छा मेरे मन की है
सभी चर्चित धर्म के ठेकेदारों
यानी  धार्मिक बाबाओं को
सौंप दूं सत्‍ता
जिनका चयन करेंगे
उनके अंधभक्‍त भक्‍तगण
बापू आसाराम, निर्मल बाबा, बाबा रामदेव
और बाबाओं और बाबियों को
बिठला दूं संसद में
जहां पर मिल जुल कर
सब अपने मन की संसद चलाएं
उछल कूद कर देश को
विकास की ऊंचाईयों के
नए  प्रतिमानों  पर पहुंचाएं
विश्‍व बुलंदी पर 
देश में काले धन में
काले रंग की  लाजवाब चमकार लाएं।

- अविनाश वाचस्‍पति


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टिकट की अनेक किस्‍में : जनसंदेश टाइम्‍स स्‍तंभ उलटबांसी 25 मार्च 2014

>> मंगलवार, 25 मार्च 2014


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चुनाव चुनौती - टोपियों की भिडंत : बॉलीवुड सिने रिपोर्टर होली अंक 19 से 25 मार्च 2014 में प्रकाशित

>> शुक्रवार, 21 मार्च 2014


टोपी भिड़ गईं और ऐसी लड़ीं कि पहनने वाले के सिर को ही घायल कर दिया। टोपी अगर टोपी न होकर हेलमेट होती तो गारंटिड पहनने वाले के सिर को कतई नुकसान न पहुंचता। पर वह टोपी थी और टोपी भी खास नहीं, आम टोपी। जिसे हरेक आम आदमी भी  ब्रांडिड ही धारण करता है। चाहे इससे उसका धर्म जाहिर हो या न हो पर राजनीतिक पार्टी के बारे में जानकारी जरूर मिलनी चाहिए। उन पर एकाएक ध्यान जाने से बेध्यानी में अज्ञानी वाला कार्य हो गया।

आप यूं तो टोपी के इसलिए इस कदर दीवाने हैं क्योंकि वही तो आपके राजनीति में आने और दिल्लीो की सत्ता में आने का सबब बनी। सिर्फ सबब ही नहीं, उसने सबक दिया कि ईमानदारी से इच्छा  हो तो देश से बेईमानी, रिश्वत, भ्रष्टाचार, महंगाई इत्या‍दि को मिटाया जा सकता है। वैसे तो सभी इस सत्य से परिचित हैं। पर इनसे करारी मात पाई कांग्रेस ने और मुंह की खाई भाजपा ने। वह इस कदर डर गईं कि उन्होंने पीएम पद हथियाने की दौड़ इन्हीं  मजबूत सड़कों यथा ईमानदारी, रिश्वत, भ्रष्टाचार, महंगाई इत्यादि पर लगा दी। उन्होंने इन मुद्दों को ही पीएम बनने के लिए इतने गहरे तक खोद लिया कि रोजाना मीडिया पर इस बारे में जिंगल, विज्ञापन हर समय सुनाई और दिखाई पड़ने लगे।
यह टोपी की करामात रही जो अन्य राजनीतिक पार्टियों के लिए करारी मात बनकर उनके चेहरे पर नजर आने लगी। इससे लाभ उठाने के लिए किसी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और आम आदमी की टोपी ने धार्मिक टोपी बनकर आम पार्टी को ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। सब जानते हैं कि इस करतूत के क्या  कारण रहे हैं, कौन पार्टियां इसे अंजाम दे रही हैं और किन हितों के संधान के लिए ऐसा कर रही हैं।

सब जानते हैं कि टोपियां बनाने में विभिन्न किस्मों के उन्नत और कामचलाउ कपड़ों का उपयोग किया जाता है। यह सस्ती  रहें और पब्लिक तक आसानी से पहुंच जाएं तो इन्हें  बनाने में लगाया जाने वाला कपड़ा सस्ता  ही होगा। उन्नत किस्म के कपड़े की टोपियां कुछ खास तरह के धार्मिक नेता और सत्ता लोलुप पहनते हैं। नेता चाहे महंगी टोपी पहनते हैं पर दरअसल वह पब्लिक को टोपी पहनाकर अपना हित साध रहे होते हैं और उनका हित किसमें है इसे आप और हम सब भली भांति जानते हैं।

टोपी पहनाने में यूं तो वोटर भी कम नहीं होते हैं। वह भी इतने वर्ष के अपने वोटदान के अनुभव से जान गए हैं नेताओं को वोट का दान तो किया जाए पर अपने प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ को सबसे उपर रखा जाए। मतलब अपने हित पूरे कर लिए जाएं और वोट किसी अन्य को दान में दे दिया जाए।

टोपी पुराण इतना ही नहीं है। इसकी कैटेगिरी में पगडियां भी शामिल हैं। एक पगड़ी की पकड़ देखिए कि मौन रहकर भी उसने अभी तक कितने ही सालों से पीएम की कुर्सी को जकड़ रखा है और सब होड़ लगाकर उसकी ओर ही दौड़ रहे हैं।

टोपी के कारण वर्तमान में खादी और खाकी की नींद उड़ चुकी है। इस उड़ान पर रोक लगाना इसलिए संभव नहीं है क्योकि यह अपनी मर्जी से उड़ने वाला कागज नहीं, उड़ाने वाले की इच्छा से सफर तय करने वाली पतंग है। टोपी की तंगहाली और पतंग की बदहाली की जिम्मेदार पब्लिक है या नेता। यह फैसला आपको करना है। आप पब्लिक भी हैं और पार्टी भी।

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होली की आधुनिक कथा : दैनिक हिंदी मिलाप 15 मार्च 2014 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

>> शनिवार, 15 मार्च 2014


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पपीता पिता है, परमात्‍मा है : दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स के स्‍तंभ 'तीखी नजर' 18 फरवरी 2014 के संपादकीय पेज पर प्रकाशित

>> मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014


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बेलन टाइट डे : डेली न्‍यूज ऐक्टिविस्‍ट 14 फरवरी 2014 अंक में प्रकाशित

>> शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014


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