अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

ऊह ला ला : इसमें डर्टी डर्टी क्‍या है, डर्टी डर्टी ....

>> बुधवार, 15 फरवरी 2012


समूचा लोकतंत्र डर्टी हो गया। विधानसभा डर्टी हो गई। तब नहीं हुआ था जब इसके मुंह पर कालिख मली जा रही थी। कालिख भी कोई और नहीं, हम भीतर वाले, आपके लोकतंत्र के सच्‍चे पहरूए मल रहे थे। कुर्सियां फेंक रहे थे, माईक तोड़ रहे थे, गालियां दे और स्‍वीकार रहे थे, हाथापाई कर रहे थे, अपनी मन और तन की मजबूती का नंगा नाच दिखला रहे थे, तब आपको कोई बुराई नहीं नजर आई, सिर्फ थोड़ा सा लोकतंत्र शर्मसार हुआ और फिर सामान्‍य हो गया। होली का त्‍योहार हो, न हो। दीवाली का इंतजार कौन करता है। जब पटाखे फोड़ने हैं, होली मनानी है – तो मनानी है, कौन है माई का लाल जो जुर्रत करे हमें रोकने की। यह तो हम गुण्‍डों की शराफत मानिए कि इतनी आसानी से इस्‍तीफा दे दिया। नहीं दे देते तो आप बर्खास्‍त कर लेते। पर उससे हमारा क्‍या बिगड़ जाता। क्‍या हमारा काला धन गायब हो जाता। हमारा काला मन गोरा हो जाता। फिर क्‍या तीर चला लिया आपने, अपनी खुद की ही बदनामी करवाई। यह तो हुआ नहीं कि कुछ ले देकर, या डर्टी पिक्‍चर खुद ही देखकर मामले को रफा, बिना कोई दफा लगाए कर देते। 
सब नाम के भूखे हैं। सबकी नीयत में छिपे हुए धोखे हैं। जब फिल्‍म देखना मना नहीं है तो पिक्‍चर डर्टी हो, तो क्‍या फर्क पड़ता है, यह कहो कि आपके सबके मन मैले हैं। जब तक हम बुराई से परिचित ही नहीं होंगे, उसकी एक एक खामी को विस्‍तार से नहीं जानेंगे तो उसे दूर करने के उपाय कैसे तलाशेंगे। पर आपकी और आपके तंत्र के समूचे लोक की मानसिकता दूषित हो चुकी है। कूड़े के पास से गुजरेंगे तो उस पर निगाह तो जाएगी ही। फिर ऐसे उपकरण ईजाद ही किसलिए किए हैं, जब इनका भरपूर उपयोग नहीं कर सकते हैं। कहने की आजादी पर तो रोक लगा नहीं पा रहे हैं, देखने की आजादी के झण्‍डे फाड़ने/उतारने पर आमादा हैं। बसंत का मौसम पीलापन लिए हुए हैं, हमें पीलापन पीलिया बीमारी की तरह महसूस होता है इसलिए आसमानी नीले की ओर रुख कर लिया। चमकती तेज तर्रार किरणमयी नीली फिल्‍म देख ली तो उसे पोर्न का नाम दे दिया। यह भी नहीं सोचा कि भगवान ने हमको इस धरती पर भेजा है, जब उसने ही कपड़े नहीं पहनाए तो हम क्‍यों उनके पावन कार्य में दखल देने चले हैं। 
हमसे अच्‍छे तो जानवर हैं, चाहे पूजा पाठ आस्‍था श्रद्धा का दिखावा नहीं करते हैं परंतु जैसे सृष्टि नियंता भेजता है, उसी हाल में खुश रहते हैं। कभी उनके यहां पर कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति खराब होती देखी है, उनके थाने, पुलिस, न्‍यायपालिका देखी है, कभी जांच बैठाते देखा है – कैसे देखोगे उन्‍हें परम सत्‍ता में विश्‍वास है, आप चाहे उसे अंधविश्‍वास का नाम दे दो परंतु विश्‍वास तो आपका आंखें होते हुए भी अंधा है, काना है। मोबाइल पर विधानसभा में बैठकर नीली फिल्‍म क्‍या देख ली, अंधों में काना राजा बना दिया। हर जगह हमारी चर्चा है, नाम है, कौन कहता है कि यह बदनामी है, यह तो आपकी बदगुमानी है। आप सुर्खियां नहीं बटोर पाए तो लगे तोहमत लगाने। मियां जरा अपने तहमद के भीतर झांका होता तो सब असलियत खुद ब खुद सामने आ जाती। हमने पब्लिकली हिम्‍मत तो की। एक आप हैं कि हमारे हौसले को परवान चढ़ाना, सम्‍मानित करना तो दूर, थुक्‍का फजीहत करने से बाज नहीं आ रहे हैं। 
सब जानते हैं कि कौन कितना दूध का धुला है, किसने अपने शरीर पर दही मला है, कौन घी में नहाया है, ऐसा कौन रह गया है, जिसने इस पानी को हाथ नहीं लगाया है। कौन सिर्फ फलों और सब्जियों के ज्‍यूस और सूप पर ही डिपेंड रहा है। कौन मदिरा से बच पाया है, जब ऐसा नहीं है तो फिर क्‍यों इतना हल्‍ला मचाया है। तूफान सब अपनी जेबों में भर भर कर ला रहे हैं, यहां तक तो पहुंच नहीं पा रहे हैं और सारी आंधी तूफान रास्‍ते में ही गिरा रहे हैं। कोई सावधानी नहीं और देश के सुरक्षा के टेंडर उठा लिए हैं। अब महसूस हो रहा है कि कित्‍ती बड़ी भूल हो गई हमसे, फिल्‍म नीली थी तो क्‍या हुआ, उसे हरा चश्‍मा पहनकर देखा जाना चाहिए था। वो दिन भूल गए जब बिग बी के घर में एक पोर्न स्‍टार को बंद कर दिया था, बंद तो नाम के लिए किया था, देश का बच्‍चा बच्‍चा उसे ही देखने को लार टपका रहा था। तब रोक नहीं लगाई गई, जब सब मन की आंखों से उसके कपड़े उतारकर उसे निहार रहे थे। संन्‍यासियों तक को सब्र नहीं हुआ, भीतर बिग बास के बंगले तक बेटी बेटी करते घूम आए, और गूगल पर सर्च करके देखने से लाज नहीं आई। इस निर्लज्‍जता को क्‍या कहा जाए। जब घपले घोटाले करते हैं, सब माल समेट बेईमानी से घर और बैंक भर लेते हैं, उतनी बेईमानी तो नहीं की हमने। हमें चाहे हमारे छोटे से अपराध के लिए कित्‍ती बड़ी सजा दे दो, परंतु हमारे मनोरंजन के हक पर डाका मत डालो, मोबाइल जेब में डालकर जेल में ले जाने देना, उसमें 3 जी का कनैक्‍शन दे देना, चाहे उसकी फीस बिल में जोड़ देना। डाकुओं पर रोक लगाओगे तो ताउम्र पछताओगे। पर इतना जुल्‍म मत करना कि नार्मल फोन पकड़ा दो। आप क्‍या सोच रहे हैं पाठक बंधु कि इन्‍हें जेल में स्‍मार्ट फोन ले जाने दिया जाना चाहिए ?

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गुण्‍डा

>> सोमवार, 30 जनवरी 2012

गुण्‍डा जयशंकर प्रसाद की कहानी का किरदार किताब से बाहर निकलकर राजनीति में अपनी घनघोर उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। अभी सप्‍ताह भर भी नहीं बीता है कि जब पीएम पद के प्रबल दावेदार ने सामने वालों को गुण्‍डा कहकर सम्‍मानित कर दिया। इससे एक छिपा हुआ रहस्‍य सच बनकर सामने आ गया कि राजनीति में गुण्‍डों का वर्चस्‍व बढ़ गया है। एकाध तो पहले भी छिपकर बेनामी तौर पर सक्रिय रहे हैं, इससे भला किसे इंकार होगा। जयशंकर प्रसाद और उनके गुण्‍डे को वह ख्‍याति अभी तक नहीं मिल पाई है, जो राजनीति के क्षेत्र में गुण्‍डा किरदार ने छोटी सी अवधि में ही हथिया ली है। 
गुण्‍डा संबोधन मन में अज्ञात भय को जन्‍म दे देता है। इस डर के सामने सिर्फ या तो गुण्‍डे ही डट पाते हैं या राजनीति के घाघ। राजनीति के सिर्फ बाज भी यहां पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, फिर बाकी पक्षी अथवा विपक्षी की क्‍या मजाल, यहां पर भाड़ को फोड़ने की जुर्रत करे। बाज को इसलिए सुरक्षित माना गया है क्‍योंकि वह दूर से ही जोखिम को ताड़ने और उससे बचने के गुर जानता है। चाहे वह ताड़ के लंबे पेड़ से भी सौ गुना ऊंचाई पर हो। बाजपना इस मायने में गुण्‍डाकारी से श्रेष्‍ठ माना गया है। खैर ... बाज को गुण्‍डों से डर नहीं लगता और न उन्‍हें लगता है जो स्‍वयं गुण्‍डाकारी के सिद्ध होते हैं। गुण्‍डों के लिए यह अनिवार्यता अब नहीं कि वह शक्‍ल-ओ-सूरत से भी गुण्‍डे नजर आएं, अब सीरत इस मायने में काफी प्रभावशाली हो गई है। कहा भी गया है कि क्‍या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सीरत छिपी रहे। मिलिए मत परंतु गुण्‍डाकारी के सीरतधारकों से आप बचे रहें, यही बेहतर रहेगा।
प्रसाद के गुण्‍डे नन्‍हकू जैसी बड़ी, तनी और घनी रौबीली मूंछों, गुस्‍सा भरी हुई लाल आंख और फड़कती हुई नाक की जरूरत और चेहरे पर चाकू के कटे के पुराने निशान हों- सिर पर बाल हों, फिर सपाट हो तो भी गुण्‍डापन निखरकर चेहरे पर दिखलाई देता है लेकिन राजनीति में गुण्‍डों को इस तरह के मेकअप करने की कतई जरूरत नहीं पड़ती है। गुण्‍डे के चेहरे पर यह सब प्रेम भाव न भी हों तो भी गुण्‍डे को कभी किसी कंपनी के आई कार्ड की जरूरत नहीं पड़ती है, कभी आपने ऐसा किस्‍सा सुना हो तो बतलाइये कि किसी गुण्‍डे ने वारदात करने से पहले अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए अपना आई कार्ड पेश किया हो। फिर भी पीडि़त का चेहरा लाल सुर्ख टमाटर हो जाता है जो कि डरे हुए लाल खून के शरीर में तीव्र संचरण के कारण जन्‍म लेता है।
यह तो आप भी मानेंगे कि भला कोई शरीफ आदमी, किसी को भी गुण्‍डा क्‍यों कहेगा। शरीफ आदमी की तो इतनी भी हैसियत नहीं होती है और न उसमें हिम्‍मत होती है कि वह चोर को चोर कहने का जोखिम चोरी कर सके जबकि चोर के ऐसे तेज पांव होते हैं कि जरा सी आहट पर ही दौड़ अथवा चार  छह मंजिल से कूद लेते हैं। चोर और डर कर भागते पैर के भूत नजर नहीं आते, यह लोक में प्रचलित है जबकि भूत जो खुद ही दिखलाई नहीं देता है तो उसके पैर इत्‍यादि भला कैसे दिखाई देंगे, यह भी विचारणीय है। चोर जब कूदते हैं तो उनके पैर टूटने की घटनाएं सुनी जाती हैं, इससे यह अनुमान लगाया गया है कि उनके पांव काफी तेज लेकिन कमजोर होते हैं इसलिए टूटते भी रहते हैं।
डकैतों और गुण्‍डों के पैर अब घोड़े भी नहीं होते और वे अब कारों और मोटर साईकिलों में गतिमान रहकर अपने कारनामों को अंजाम देते हैं। उनके हाथों में हथियार होते हैं, न भी हों तो उनके हाथ ही हथियार होते हैं। वे जहां जहां से गुजर जाते हैं, वहां से शरीफ आदमी उनके आने से पहले गुजर चुके होते हैं। अगर कोई शरीफ गलती से बाकी बचा रह गया हो तो उनके आने की आहट मात्र से पतली गली से सरक लेता है।
अब इतना तो तय है कि गुण्‍डों के सामने या तो गुण्‍डा या खांटी राजनीतिज्ञ ही टिक सकता है और उससे पंगा ले सका है। पंगा लेने की वजह हो, न हो  चुनाव हों, न हों। चुनाव कभी भी आ सकते हैं। कितनी ही शब्‍दों की ठोकरें देश-प्रदेश के बूढ़े सियासतदान मारते रहते हैं। वह पहले से ही बने हुए अपने माहौल में कमी नहीं आने देना चाहते हैं। एक बार जो साम्राज्‍य स्‍थापित हो चुका है, उसे छोड़ने का रिस्‍क भला कौन ले, इसलिए वे भी अपनी बुद्धि की शौर्यता का उपयोग करते रहते हैं।
गुण्‍डों से डरने का ठेका बिना ठेके के, शरीफ आदमी ने ले रखा है  वह डरता है, डर डरकर पढ़ता गीता है, पपीता खा खाकर अपने पेट की बीमारियों को सीता है और वोट देने के लिए जीता है। उसका बड़ी ख्‍वाहिशों से पाला गया वोट, सम्‍मोहित कर हथिया लिया जाता है। हथियाने वाले को आप गुण्‍डा मत कहिएगा, वे आपस में खुद ही अपनी पहचान जाहिर कर रहे हैं, इतने समझदार-शरीफ तो आप हैं ही न ?

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जूते का नाजायज संबंध

>> बृहस्पतिवार, 26 जनवरी 2012


चुनाव चिन्‍ह जूता जिसने भी इस सूचना को पढ़ा, पहले तो वह चौंका। फिर जोर जोर से भौंका, उसके भौंकने का आशय यही निकला कि इस चुनाव चिन्‍ह को लेने का तो उसकी पार्टी का अधिकार है, उसने इतिहास बतलाया कि सबसे पहले उसकी पार्टी के कद्दावर नेता ने जूता खाया था और कद नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया था। इस तरह के अनेक दावे वह सभी पार्टियां कर रही थीं, जिन्‍होंने जूता मारने पर, मारने वाले को इतना मारा था कि वह मर कर जी उठा था। कितने ही जूते मारने वालों ने तो पुस्‍तक लिख दीं, कितने ही चुनाव में खड़े होने का विचार करने लगे, वह बात दीगर है कि किसी पार्टी ने उनके नाम पर विचार नहीं किया क्‍योंकि उनका यह मानना रहा है कि जूते से पाई हुई लोकप्रियता स्‍थाई नहीं है। पैसे और शराब इत्‍यादि से पाई गई सफलता, चुनावों में सफलता पाने की ऐसी कुंजी है जो आज तक कभी विफल नहीं हुई है और उसके स्‍थाईत्‍व को लेकर भी आज तक सवाल नहीं उठाए गए हैं।
जब सब पार्टियां जूता खाना चाह रही हों तो सोच रहा हूं कि उन्‍हें इस अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और अलग-अलग पार्टियों को अलग-अलग ब्रांड के, अलग अलग वैरायटियों के, फीते वाले या बिना फीते वाले, चमड़े वाले, रैक्‍सीन वाले, कपड़े वाले बतौर चुनाव चिन्‍ह अलॉट कर ही देने चाहिए। जनता का क्‍या है, उसे तो जूते मारने हैं इसलिए वह तो पत्‍थर के जूते बनवाकर, मारन क्रिया को उससे ही संपन्‍न कर लेगी। इसमें बस यही जोखिम है कि जिसे पत्‍थर का जूता लग गया, वह तो जीवन से गया। निशाना सही बैठने पर, जिसके जूता लगेगा, वह खड़ा भी नहीं रह सकेगा। फिर टिकट लेकर खड़े होने पर भी पत्‍थर का जूता खाकर लोट गया तो सियासी जीवन तो बेकार गया, समझ लीजै।
वैसे चुनाव चिन्‍ह जूता अलॉट करने की प्रक्रिया के कानून बनने तक सरकार इस कोशिश में भी जुट गई है कि जूता बनाने, बेचने के धंधे को गैर-कानूनी घोषित कर दिया जाए। इसे लागू करने में किसी प्रकार का रिस्‍क न रहे, इसके लिए सरकार स्‍वहित में किसी से भी सलाह लिए बिना, इस बाबत तुरंत अध्‍यादेश जारी कर रही है। वह इसका हश्र लोकपाल की तरह नहीं होने देना चाहती है। सरकार की मंशा साफ जाहिर है, वह सोशल साइटों यथा फेसबुक, ट्विटर, ब्‍लॉग पर रोक लगाने से तो रुक सकती है परंतु जूते पर रोक लगाने से नहीं रुकना चाहती। इससे फेसबुक, ट्विटर, लिंकेदिन जैसी सोशल साइटों को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वह सर्वाधिक लोकप्रिय हैं और सत्‍ता तक पलटने की ताकत रखती हैं। लानत है इस बात पर कि उन्‍हें जूतेकी मारक क्षमता का पूरा ज्ञान नहीं है कि वह न लगकर भी, लगने से अधिक चोट देता है, जिसकी टीस बाकी समय तो चीख परंतु चुनावों के समयमीठी खीर के मानिंद स्‍वाद देती है।
जूते, खीर, लोकपाल और सोशल साइटों का वैसे तो आपस में कोई संबंध नहीं है परंतु चुनावों के मौकों पर नाजायज संबंध परवान चढ़ते रहे हैं और यह संबंध भी उन्‍हीं में से नजर आ रहे हैं, क्‍या आपको इस राह में भी धोखे नजर आ रहे हैं ?

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नया साल आया है, नहा लूं या पानी मैं बचा लूं

>> रविवार, 1 जनवरी 2012


क्‍या इस साल पहले दिन ही मैं नहा लूं
या पानी बचा लूं
और सर्दी से भी बच जाऊं
अगले साल करूं गर्म
और उसी से नहाऊं
या मिल रही हैं
मित्रो की शुभकामनाएं
उसी में नहाता रहूं
गीत नए साल के गाता रहूं
गुनगुनाता रहूं
.... दिल्‍ली की सर्दी ....
कह रही है कि 
दिल्‍ली के दिल वालों
शुभकामनाओं में ही नहा लो
पानी बचा लो
इस पानी से किसी की 
तो प्‍यास बुझेगी
सर्दी में नहाने से
शरीर पर से कौन सी
मैल की परत हटेगी

परत हटानी ही है तो
बुराईयों की परत को
मन पर से हटाओ
और उसके लिए
तेजाब को काम में लाओ
वह तेजाब 
जो अच्‍छाईयों से 
बनाया गया हो
सबकी शुभकामनाओं से
सजाया - संवारा गया हो।

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रात की कविता

>> रविवार, 18 दिसम्बर 2011

उमेठ तो दूं 
लेकिन किसके
कान
खता कान ने
तो नहीं की है। 

सपने बोये थे

सोते समय रात को
न जाने कौन
ज्‍यूस बनाकर
पी गया।

सुबह जागा

तो न सपने थे
न पास में अपने थे
सेबों की कौन कहे ?



अब आप ही बतलायें

किसकी कहें
किस्‍से किस से कहें
कैसे कहें
सो रहे हैं मित्र मेरे
सपने बेच कर।

पूछा तो कहने लगे

घोड़े अब
खरीदता कोई नहीं है। 

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क्‍या आप चांटा खाने वालों में शुमार होना चाहते हैं ?

>> सोमवार, 28 नवम्बर 2011


वे चिंतन में थे कि गाल तन का ही बेहद मुलायम हिस्‍सा है, नेताई गाल पर पड़ा तमाचा अब बना सुर्खियों का हिस्‍सा है।  जो चाहे कड़ाके की सर्दी हो,भीषण गर्मी – प्रत्‍येक मौसम का रियल अहसास तन को कराने वाला संवेदनशील सेंसर है। एक सरदार ने असरदार बनने के लिए उनके गाल का सेंसर अपने कनटाप से सक्रिय कर दिया। तमाचे का नेता के गाल पर आम आदमी का इस्‍तेमाल वैध है या अवैध, इस पर सरकार ने जांच कमेटी की घोषणा कर दी है। जिससे यह सच्‍चाई खुलने की प्रबल संभावना बन गई है कि जो सामने है, वह सच्‍चाई है या जो सामने नहीं आई है, वह सच्‍चाई है। सच्‍चाई को सामने न आने देने के लिए कौन जिम्‍मेदार है, क्‍या इन्‍हीं की मिलीभगत से झूठ सदा सबके सामने अपनी ढीठता का प्रदर्शन करता रहा है। इसकी परिणति इस प्रकार चांटों के तौर पर गूंजना क्‍या देशहित में जरूरी है। वैसे यह निश्चित है कि अगर नेताओं ने इस मामले को भरपूर तूल दिया तो सरकार की ओर से इस पर एकमुश्‍त मुआवजा राशि की घोषणा की जा सकती है लेकिन मुआवजे की घोषणा के बाद इस प्रकार की दुर्घटनाओं की बाढ़ आ जाएगी और खाने और खिलाने वाले दोनों इसे कैरियर के तौर पर स्‍वीकार लेंगे। चढ़ती हुई महंगाई और तेजी के साथ बढ़ने लगेगी। खिलाने वाले सम्‍मान के रूप में पुरस्‍कार और और खाने वाले को मुआवजे के रूप में जो राशि मिलेगी, उससे निश्चित ही महंगाई का ग्राफ ऊपर की ओर ही बढ़ेगा।
थप्‍पड़ बचपन में बच्‍चों के गाल पर सिर्फ माता-पिता या जिम्‍मेदार अभिभावक ही नहीं मारते हैं बल्कि थप्‍पड़ कला के द्रुत विकास में अध्‍यापकों का भी महत्‍वपूर्ण योगदान है। जब यह तमाचे के रूप में छात्र के गाल पर छप जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया छात्र के पढ़ने में बदल जाती है। यह थप्‍पड़ की सकारात्‍मकता है फिर भी इस लगाई गई रोक इस कलाकारी के विकास में बाधक बन गई है। सरकार भी इसे नाजायज ठहरा चुकी है। जिसका नतीजा ऐसे युवाओं के रूप में सामने आ रहा है जिनके हौंसले परवान पर हैं और वे हिंसक, क्रूर और उच्‍श्रृंखल हो रहे हैं। बचपन में पड़ने वाला थप्‍पड़ पढ़ने के लिए तो प्रेरित करता ही था, उससे अध्‍यापक के हाथ और छात्र के गाल का भी जरूरी कसरत हो जाती थी और मांसपेशियों में रक्‍त का प्रवाह सुनिश्चित रहता था। फलस्‍वरूप, गाल पर लालिमा रहती थी, इस चमक का प्रभाव गाल के जरिए मानस पर दिखाई देता था। तमाचे रूपी इस कसरत की बहाली के लिए प्रयास किए जाने जरूरी हैं।
एक रहपट ने कितनी ही उम्‍मीदों के पट ओपन कर दिए हैं। कितने ही व्‍यवसायों में भरपूर तेजी की उम्‍मीदें दिखाई दी हैं। मेरी सलाह है कि नेता देश चलाते समय हेलमेट धारण करके रखें, जिससे ऐसी दुर्घटनाएं होने पर उनके गोल गोल गाल सलामत रह सकें। गालों की सलामती के लिए हेलमेट की उपयोगिता को ध्‍यान में रखते हुए सरकार यह भी विचार करने को बाध्‍य हुई है कि नेताओं के हेलमेट धारण न करने पर जुर्माना और धारण करने पर राजस्‍व की प्राप्ति हो। इसके लिए तुरंत ही आवश्‍यक अध्‍यादेश देश में लागू करने पर संसद में प्रस्‍ताव पारित कराया जाएगा। सरकार ने यह भी साफ किया गया है कि इस मामले में जनलोकपाल बिल की तरह टालमटोल नहीं की जाएगी और न ही चालू रवैया अपनाया जाएगा।
थप्‍पड़ संस्‍कृति के विकास के हर संभव उपाय अपनाए जाने चाहिए। विभिन्‍न वर्गों में इसकी उपयोगिता के मद्देनजर अखिल भारतीय अथवा वैश्विक प्रतिस्‍पर्द्धाओं का आयोजन किया जा सकता है। थप्‍पड़ खाने से क्‍या पेट भरने का अहसास होता है और तो और क्‍या यह इतना जायकेदार होता है कि इसे खाने के प्रति नेताओं में भगदड़ मच जाए क्‍योंकि इस संदर्भ में दिया जाने वाला मुआवजा दो चार करोड़ से कम का तो होगा नहीं, इस राशि को देखकर ही मुंह की लार बेकाबू हो सकती है।
तमाचा संस्‍कृति के सकारात्‍मक पहलुओं पर विचार किया जा रहा है।  थप्‍पड़ कला रूपी संस्‍कृति के विकास के लिए योजनाएं बनाने में तेजी आने की उम्‍मीद जतलाई गई है।  किसी भी दल ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दाग नहीं बतलाया है और थप्‍पड़ से चिंतन-मनन की प्रक्रिया में तेजी आई है। इससे इन पंचलाईनों का भविष्‍य  ‘ गाल पर दाग अच्‍छे हैं,  दाग बोले तो पंजे का निशान – लोकतंत्र का लोक नेता पर हो रहा है मेहरबान।‘ वैसे एक बात जरूर बतलाइयेगा कि क्‍या आप चांटा खाने वालों में शुमार होना चाहते हैं ?

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अन्‍ना हमारे की कोर कमेटी

>> सोमवार, 14 नवम्बर 2011

अन्‍ना ने कहा है कि कोर कमेटी में साफ सुथरी छवि के लोग ही भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन का हिस्‍सा बनें। 

छवि निखारने वाले उत्‍पाद निर्माताओं के लिए अपने प्रॉडक्‍ट बाजार में उतारने और खूब जोरदार मार्केटिंग करने का एक ऐसा नायाब मौका, जो निकट भविष्‍य में, बल्कि इस शताब्‍दी में भी दोबारा नहीं मिलेगा। चल निर्माता : निरमाफेम, फेयर एंड लवली, छविबाई, एक्‍सल इत्‍यादि नींद से जाग।

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