अंगूठा हूं मैं एक / ऊंगलियां चार / मिले सब हथेली हो गई तैयार / दसों से करता हूं कीबोर्ड पर वार / कीबोर्ड ही है अब मेरे लिखने का हथियार जब बांध लिया तो बन गया मुक्‍का / सकल जग की ताकत है अब चिट्ठा।

>> शुक्रवार, 20 मार्च 2015

ICICI SAVING BANK ACCOUNT NO, 629401135858/110229017 BANK DETAILS ICICI BANK, SHAKUNTALA APARTMENTS, NEHRU PLACE, NEW DELHI IN THE NAME OF SARVAISH VACHASPATI WIFE OF AVINASH VACHASPATI.
OR SBI SAVING BANK ACCOUNT NO, 20190460651 NEHRU PLACE BRANCH IN THE NAME OF AVINASH VACHASPATI, 
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परिकल्पना व्यंग्य भूषण सम

>> शनिवार, 13 दिसंबर 2014


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तुमने किसी को मीठा खाकर मरते हुए देखा है - मधुमेह दिवस पर विशेष कविता अविनाश वाचस्‍पति

>> गुरुवार, 13 नवंबर 2014

तुमने किसी को
मीठा खाकर
मरते हुए
देखा है

देखो वह
डरकर
मीठे से
कर रहा है
परहेज

खा रहा है मीठा
रात को फ्रिज
खोलकर
फिर भी है
जिंदा
इै इसी धरती
का बाशिन्‍दा

नहीं खा रहा है मीठा
इसलिए मीठी चीजों की
देख लो जान जा रही है
हलवाई डर रहा है
सोच रहा है खोलूं
नमकीन की दुकान

पर नमकीन पकवान
कौन खाएगा मेहरबान
नमकीन खाकर भी
तेल से उसकी जान
जा रही है

बचा लो उसे
जिस पर हो रही है
मधु की बरसात
गंदे तेलों से मुलाकात

जिसने मरना है
उसे बचा नहीं सकता
न भगवान
न चमराज

तुमने किसी को
मीठा खाकर
मरते हुए देखा है

देख लो
खा रहा हूं रोज
मीठा
चाहे दिन हो या रात
फिर भी हूं जिंदा
इस धरती का बाशिन्‍दा

मीठा इस बात पर
हो रहा है शर्मिन्‍दा।

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पहल (कविता) अविनाश वाचस्‍पति

>> गुरुवार, 6 नवंबर 2014

कविता
पहल
- अविनाश वाचस्‍पति
पहल खुद पहलकारक हो
तो अच्‍छा लगता है
पर पहेली का न बने
न पैदा हो पहले से
पहल ही रहता है
पहल का हल
सदा विचारों की फसल
उपजाता है
शून्‍य से खुद को
भीतर तक जलाया है
झुलसाया है
सच बतलाऊं
भीतर तक तपाया है
पहल पर्याय का हो
कविता, कहानी, उपन्‍यास
नाटिका, नौंटंकी या
किसी भी विघ्‍नबाधा की पहल
पहल ही करता है
या नहीं
पर पहल हो जाती है

पहल की गाड़ी
सड़क निर्माण से पहले
पगडंडी पर दौड़कर
आगे निकल जाती है
किसी को सुनाई दे या न दे
पर पहल का कोलाहल
कल कल करता मन
को भीतर तक मोहता है
मन से धान को मल मल
पर मन को कल कल रास आती है
पर ध्‍वनि यह न रास से
न रस्‍सी से बांधी जाती है।
-    अविनाश वाचस्‍पति
-साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन 01141707686/08750321868 ई मेल nukkadh@gmail.com



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इंतजार कायम रहे (कविता) अविनाश वाचस्‍पति

>> शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

नाउम्‍मीदी में खुशियों की ईद है
जो कल गई है वापिस वो दीवाली है
मन में मिलने की हरियाली है
सबसे प्‍यारे हैं इंतजार के क्षण
जल्‍दी भंग नहीं होते, भंगर नहीं होते
इंतजार में होता है सुकून
जब होता है सुकून
तब और कुछ नहीं होता
न होती है चिंता
नहीं होता है तनाव
मिलने की आब मन में
बसी रहती है
जब इंतजार होता है
तब और कुछ नहीं होता जनाब

विचारों का यह एक ऐसा सोता है
जो सदा लगता है सकारात्‍मकता में
फबता है सकारात्‍मकता में
कभी नकारात्‍मक नहीं होता है
सोना यह सोना है
स्‍वर्ण नहीं है
स्‍वर्ण तो वह इंतजार है
जितना चाहे मिल जाए
पर भूख इसकी मिटती नहीं है
प्‍यार इसकी घटती नहीं है
बनती है ऐसी घटना
कि चाहकर भी घटती नहीं है

इंतजार खुशियों की झोली है
जो आने वाली है वह होली है
अभी कल जो गई है वह दीवाली है

इंतजार से ही
कभी पैदा होती है नाउम्‍मीदी की सब्जियां
हरी हरी फलियां, लाल लाल टमाटर
महंगा प्‍याज, बैंगनी बैंगन
पर इन सबसे हरियाली है
रंग कोई भी हो
हरियाली भाती है
रंगों की धरोहर है
पर्यावरण का जौहर है
जौहरी कोई नहीं
पर इंतजार है

इंतजार में ही सारा संसार है
संसार का व्‍यापार है
वैज्ञानिकों का तकनीकी संसार है
सारा सार इसी में है
इंतजार है

पर प्‍यार इसी में है।

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संतुलन अथवा असंतुलन - अविनाश वाचस्‍पति (कविता)

>> शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

चलने वाले दो पैर पर
अचरज नहीं होता
न मुझे, न तुझे और
न किसी अन्‍य को।
धरती पर मौजूद
इंसान से गिनें तो
उपकरणों पर रुकें
पक्षी भी मिलें
संतुलन का पर्याय
साइकिल से शुरू करें
टू व्‍हीलर तक सब
संतुलन धर्म निबाह रहे हैं।
जानवर चलते-दौड़ते
चार पैरों पर तेज गति से
गति से होकर मुक्‍त
दुर्गति को होते प्राप्‍त
कुत्‍ते से गिनती करें
सूअर से आगे बढ़ें
पहुंचें चींटी तक।
वाहनों में भरकर
वाहन तक पहुंचें
कार से लेकर जीप तक
सब असंतुलित।
दो पैर सदा संतुलित
इंसान के
चार ही तो हैं असंतुलित
मोटरकार, जानवर के
चार पैर चलते तेज
होते असंतुलित।
दो पैर सधे हुए
चार असंतुलित
जैसे जानवर, कार के
संतुलन और असंतुलन
इंसान और जानवर का अंतर
भेद देता है, खोल देता है
रहस्‍य सब
तेज गति दुर्गति का पर्याय
रोज भोग रहे हम।

मोटरगाड़ी होती असंतुलित
साइकिल सदा संतुलन में
गति कम कंट्रोल अधिक
गति तेज दुर्गति की जन्‍मदाता।
एक कवि ने कहा है
बाहर भीतर एक समाना
तब कहा होगा
रहा होगा समीचीन
पर अब नहीं
वह जमाना।
न बाहर
न भीतर
एक अथवा अनेक
कोई भी नेक
नरक में बसते हैं
स्‍वर्ग को तरसते हैं
इस चाहत में
चाहते हैं सब
मरना, अमर नहीं कोई
किसी आयु का
किसी भी वायु में
उड़ जाते हैं
ख्‍यालों की तरह
कल्‍पनाओं को लगाकर पंख।
आंक सके तो आंक
लेकर मन की आंच
जो कहा है मैंने
सच कहा है
सच के सिवाय
कुछ नहीं है
और न कहा है।
-    अविनाश वाचस्‍पति

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गोवा की शाब्दिक सैर – हिन्‍दी फिल्‍म फाइंडिंग फेनी के बहाने

>> शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

फाइंडिंग फेनी हिंदी फिल्‍म का असली आनंद लेने के लिए गोवा निवासी अथवा गोवा का पर्यटक होना बहुत जरूरी है। पर्यटन कम से कम एक सप्‍ताह भर का रहे तो समंदर के नमकीन पानी से शर्बत की मिठास का आनंद मिल सकता है। ऐसे मुक्‍तभोगी ही फिल्‍म का सही लुत्‍फ ले सकते हैं। गोवा की गांव संस्‍कृति आज भी शहरीकरण के बदलावों से कोसों दूर बदस्‍तूर कायम है। गांव की पगडंडियों और खटारा पर चलने वाली सडकों पर कार का साथ सच्‍चा मजा दे सकता है। किसी फिल्‍म में कम लागत का यह अच्‍छा उदाहरण है। जिस पर तकनीक के उन्‍नत उपयोग के कारण इस फिल्‍म के बनाने पर अधिक खर्च करने से बचा गया है। फिल्‍म की कहानी एक पुरानी कार, बिल्‍ली यानी कुल मिलाकर छह पात्रों के चारों ओर इस प्रकार बुनी गई है जो कि बनावट से दूर साफ सुथरी बचपन के प्‍यार की सच्‍ची कॉमेडी है। इस व्‍यंग्‍य फिल्‍म में सभी किरदार खासे चर्चित नाम हैं, वैसे बिल्लियां भी कम फेमस नहीं होती हैं। फिल्‍म के अच्‍छे संदेशों को अपनाना फिल्‍म को सफल बनाता है। बनिस्‍वत इसके इसमें पुरानी दशा की जीर्ण शीर्ण पर चलने वाली कार का मालिक होना एक अच्‍छा दर्जा दिलाता है। उस पर तुर्रा यह कि कार चालक यहां पर ऊंगलियों पर गिने जा सकने लायक हैं। इसी कारण सहज ही यह कयास लगाना नामुमकिन नहीं है कि यहां की ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी के पास कितने कर्मचारी और काम रहता होगा। यहां पर बाजारों में बतौर टैक्‍सी व मोटर साइकि‍ल चलती हैं। इसके बावजूद कारों और टू व्‍हीलरों को किराए पर देना भी एक प्रमुख व्‍यवसाय है। रेलवे स्‍टेशन से शहर की दूरी काफी लंबी है। मेरी पहली के बाद दूसरी यात्रा में मेरे पेट में एकाएक उठे दर्द ने मुझे दर्द से संघर्ष की जो ताकत दी है, वह आज हेपिटाइटिस सी होने पर अब भी मेरे भीतर पूरी शिद्दत से मौजूद है और रोग की भीषणता में भी मुझे सक्रिय और जिंदा रखे हुए है। इस दौरानी प्राथमिक उपचार जिन डॉक्‍टर से मिला उनका नाम भी अविनाश मिला। जिस बस में हम कार्यालयीन सहयोगी स्‍टेशन से आ रहे थे, उसके पीछे दौड़ते कुत्‍ते मुझे अब भी रोमांचित करते हैं। इस वे भी आसानी से पर्यटकों को चलाने के लिए मिल जाती हैं। टू व्‍हीलर और फोर व्‍हीलर आप इंधन डालकर चला सकते हैं। कम दूरी के लिए दो सवारी वाले थ्री व्‍हीलर या अकेले के लिए मोटर साइकिल यहां पर मुख्‍यत: मिलते हैं। चाय सिगरेट, कोल्‍ड ड्रिक्‍स, ब्रे्ड, दूध, केले, साबुन, पेस्‍ट, शैम्‍पू इत्‍यादि के पाउच में भी यहां के सुनसान खोखों पर मिल जाते हैं। ऐसा अनुभव गोवा के वीआईपी इलाके का भी यहां का है। यह अहसास पहली बार महीने भर से अधिक समय के लिए सरकारी आवासीय कालोनी अल्‍टीनो में अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म्‍ समारोह में कार्य करके बरस 2004 के नवम्‍बर तथा 2005 के जनवरी माह में हासिल किया। यहां का सुबह का ठंडा मौसम दोपहर को सूरज की आग उगलने लगता है और शाम को भी ठंडक गोवा की खास पहचान है। सुबह जागिंग पार्क में सुबह सवेरे की सैर का आनंद मन को प्रफुल्‍लता से भर देता है। ईमानदारी यहां के निवासियों की नस नस में बल्कि आचरण संस्‍कृति का हिस्‍सा है। आप सिर्फ दरवाजा भेड़ कर घर से बाहर आ अथवा जा सकते हैं और कोई आपके फ्लैट में नहीं घुसेगा जिससे चोरी चकारी का डर नहीं रहता। पार्क में सैर के समय आप पूरे पार्क में कहीं भी अपने जूते चप्‍पल छोड़ सकते हैं। दूध सब्‍जी इत्‍यादि सामान रख् सकते हैं और वह वापिस वहीं पर मिलेगा। यहां की दुकानें और खोखे संभवत: सुबह 6 बजे तक खुल जाते हैं और शाम को अधिकतम चार या पांच बजे तक बंद कर दिए जाते हैं। हिंदी अखबार राजस्‍थान पत्रिका आसानी से मिल जाता है जिसकी यहां पर काफी मांग है। नवभारत टाइम्‍स हिंदी भी दोपहर तक यहां पर मिल जाता है। हिंदी की चुनिंदा पत्रिकाएं यहां पर मिल जाती हैं। अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकाएं बहुत सरलता से सब जगह मिल जाती हैं। भारत के अन्‍य प्रदेशों के लोग यहां पर आकर व्‍यापार करते हैं। खरीदारी के समय रेजगारी की तनिक भी कठिनाई नहीं हुई, अठन्‍नी चवन्‍नी व्‍यवहार में मिलीं। चिल्‍लर की किल्‍लत दूर दूर तक गोवा में नहीं है। पर चवन्‍नी पर सरकारी रोक लगाए जाने के कारण बंद कर दी गई हो तो वह बात दीगर है। वरना तो जब तकइमैं वहां पर रहा उस समय खूब प्रचलन में थीं। यहां पर घूमना काफी सुखद है। शाम होते ही बियर और पार्टियों का जो चलन यहां पर है वह अन्‍यत्र न‍हीं मिलता। उस पर छेड़छाड़ वाली हवा यहां के पर्यावरण से होकर नहीं गुजरती है। कौओं, कुत्‍तों और यहां की छिपकलियों की यहां पर खास तौर पर पहचाना जा सकता है। पक्षियों की चहचहाहट से लबालब यहां का माहौल प्राकृतिक मौजूदगी का अहसास कराता चलता है। गोवा में गांव का आनंद यहीं पर आता है। फिल्‍म फ्रेंडी फेंडी देखकर यहां पर घूमने और रहने के लिए दिल का ललचाना स्‍वाभाविक है। यहां के समंदर, चर्च और बियर बार और दुकानें मन मोह लेते हैं बल्कि संस्‍कृति का हिस्‍सा हैं। गोवा रूपी गांव की दास्‍तां और भी हैं जिसमें वहां पर एकाएक होने वाली बरसात, सब्‍जी मंडी, मछली बाजार, समंदर से आती मछलियों की महक, कैसिनो डिनर तथा डांस, वहां पर लगने वाली बाजार और रात्रि बाजार, समंदर के किनारों की खूबसूरती, यहां के निवासियों का निच्‍छल प्‍यार, इनके साथ हिंदी-उर्दू के ब्‍लागरों की स्‍मृतियां अब भी एकदम गन्‍ने के ताजा रस के माफिक हैं। इससे जीवंत अहसास होता है कि जीवन की जीवंतता दर्द में भी है, बीमारी में भी जो संघर्ष की एक अटूट ताकत प्रदान करती हैं। इसलिए ही कहा गया है कि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत तथा इस मौके पर एक हिंदी फिल्‍मी गीत याद आ गया है ‘जीवन सुख दुख का संगम है’ जिसमें गम के संग जीवन है, दर्द के संग जीवन है जो जीने की अटूट आस्‍था और विश्‍वास से सराबोर है। अविनाश वाचस्‍पति, स्‍वत्‍वाधिकारी, ‘आलोक प्रकाश’, साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, नियर इस्‍ट ऑफ कैलाश, नई दिल्‍ली 110065 फोन 011 41707686/08750321868 E mail nukkadh@gmail.comICICI SAVING BANK ACCOUNT 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